Sunday, January 8, 2023

मुस्लिम‌ समाज में ग़रीबों की ज़िंदगी पुर सुकून बनाने के लिए इस्लामी निज़ाम

मुस्लिम‌ समाज में ग़रीबों की ज़िंदगी पुर सुकून बनाने के लिए इस्लामी निज़ाम

🖊️ जैनुल आबिदीन क़ासमी

ख़ादिम जामिया क़ासमिया अशरफ़ुल उलूम नवाबगंज अलियाबाद जि० बहराइच यू०पी

क़ुरआने करीम एक ऐसी किताब है जिसने इन्सानों के पस्मांदा, दबे कुचले और ग़रीब तब्क़ा का बड़ा ख़्याल रखा है, चुनांचे उन‌की दुनियावी ज़िंदगी को पुर सुकून और राहत वाली ज़िंदगी बनाने के लिए मालदारों पर हुक़ूक़ मुक़र्रर करके उन की अदाइगी का हुक्म भी दिया है।

यह और बात है कि मालदारों ने उन हुक़ूक़ की अदाइगी का जिस तरह एहतिमाम करना चाहिए नहीं किया जिसकी वजह से आज मुस्लिम समाज में कितने लोग ग़ुर्बत की वजह से परेशान रहते हैं, कोई खाने पहेनने का मुहताज है, किसी के पास रहने के लिए मुनासिब मकान नहीं है, कोई दवा ईलाज के लिए पैसों का मुहताज है, कोई पैसों के ना होने की वजह से अपने बच्चों को अच्छी तालीम (शिक्षा) नहीं दे पा रहा है, कोई पैसे ना होने की वजह से कारोबार नहीं कर पा रहा है ग़र्ज़ ग़ुर्बत की वजह से एक ग़रीब आदमी मुख़्तलिफ़ तरीक़ों से परेशान रहता है।

जो आदमी ग़रीब होता है तो ऐसा तो है नहीं कि उस के सारे रिश्तेदार भी ग़रीब ही हूँ। अगर एक आदमी ग़रीब है तो उस के दसियों रिश्तेदार मालदार भी होते हैं।

अब उन मालदारों को अल्लाह तआला ने क़ुरआने करीम में दो जगह हुक्म दिया है कि
तुम रिश्तेदार को उस का हक़ दो

एक जगह पंद्रहवें पारे में सूरह-ए-बनी इसराईल की छब्बीसवीं आयत में हुक्म दिया:
(और तुम रिश्तेदार को उस का हक़ दो)

दूसरी जगह इक्कीसवें पारे में सूरह-ए-रुम की अड़तीसवीं आयत में हुक्म दिया:
(लिहाज़ा तुम रिश्तेदार को उस का हक़ दो)

इन‌ दोनों आयाते करीमा में अल्लाह ने जिस हक़ को देने का हुक्म दिया है उस से मुराद माली हक़ है।

यानी अल्लाह तआला ने मालदारों के माल में उन के ग़रीब रिश्तेदारों का भी हक़ रखा है, और फिर मालदारों को ये हुक्म भी दिया है कि ग़रीब रिश्तेदार को उस का हक़ दो।

और ये हक़ ऐसा है जो हुक़ूक़ुल इबाद मैं आता है, और हुक़ूक़ुल ईबाद का मुआमला ऐसा है कि जब तक हक़ वाला माफ़ न करे अल्लाह तआला भी माफ़ नहीं फ़रमाएँगे। यानी अगर मालदार अपने माल में से अपने ग़रीब रिश्तेदार को न दे तो वो मालदार इतना बड़ा मुज्रिम है कि जब तक वो ग़रीब रिश्तेदार माफ़ न करे अल्लाह तआला उस मालदार को माफ़ नहीं फ़रमाएँगे, और ग़रीब रिश्तेदार के हक़ के बराबर मालदार की नेकियां ग़रीब को दे दी जाएँगी, और अगर मालदार के पास ग़रीब के हक़ के बराबर नेकियां नहीं होंगी तो ग़रीब के गुनाह मालदार के ऊपर लाद दिया जाएगा।

लिहाज़ा कोई मालदार ये न समझे कि ये मेरा माल है, और इस में सिर्फ मेरा ही हक़ है, मैं जिस तरह चाहूँ ख़र्च करूँ, नहीं, नहीं, ये माल अल्लाह का दिया हुआ है, और इस को उसी तरह ख़र्च करना है जैसा अल्लाह ने हुक्म दिया है, और इस‌ माल में अल्लाह ने जिन जिन का हक़ रखा है उन को देना पड़ेगा, इस माल में अल्लाह ने ग़रीब रिश्तेदार का भी हक़ रखा है, इसलिए अपने माल में से ग़रीब रिश्तेदार को देना होगा।

यहाँ एक और बात ग़ौर करने की है कि मालदारों के माल में ग़रीब रिश्तेदार का हक़ है मगर ग़रीब रिश्तेदार को ये हुक्म नहीं दिया गया है कि मालदार रिश्तेदारों के पास जाकर अपना हक़ मांगे; बल्कि मालदारों को हुक्म दिया गया है कि तुम अपने ग़रीब रिश्तेदार को उस का हक़ दो। लिहाज़ा मालदारों की ये ज़िम्मेदारी है कि वो अपने ग़रीब रिश्तेदार तक उस का हक़ पहुंचाएं, मालदार इस इंतिज़ार में हरगिज़ न रहें कि ग़रीब रिश्तेदार मांगने आए तब उस को देंगे; बल्कि ग़रीब रिश्तेदार आए या न आए मालदार ख़ुद उस का हक़ उस तक पहुंचाए। क्यूँकि ग़रीब रिश्तेदार को अपना हक़ मांगने का हुक्म नहीं है बल्कि मालदारों को हुक्म है कि वो ग़रीब रिश्तेदार का हक़ उस को दें।

इसी लिए अगर ग़रीब अपने मालदार रिश्तेदारों के पास अपना हक़ मांगने न जाये और ग़ुर्बत में ज़िंदगी गुज़ार कर चला जाये तो क़ियामत के दिन उस से ये पूछगछ नहीं होगी कि तुम अपने मालदार रिश्तेदार के पास अपना हक़ मांगने क्यों नहीं गए थे; लेकिन अगर मालदार अपने ग़रीब रिश्तेदार को उस का हक़ न दे और वो ग़ुर्बत की ज़िंदगी में परेशान रहे तो क़ियामत के दिन मालदार से पूछगछ होगी कि तुम‌ने अपने ग़रीब रिश्तेदार का हक़ क्यों नहीं अदा किया था।

अब अगर क़ुरआने करीम के इस हुक्म पर अमल करते हुए हर मालदार अपने ग़रीब रिश्तेदार को उस का हक़ देने लगे, और उस की ज़रूरियात का ख़्याल रखने लगे तो समाज में कोई भी ग़रीब परेशान हाल नहीं रहेगा; क्यूँकि हर ग़रीब आदमी के दसियों रिश्तेदार मालदार होते हैं, हर मालदार थोड़ा थोड़ा भी अपने ग़रीब रिश्तेदार को देने लगे तो उस की परेशानियाँ दूर हो जाएंगी, उस की ज़िंदगी भी पुर सुकून बन जाएगी, और दर-दर की ठोकरें खाने और गिरी हुई नज़रों से देखे जाने से भी बचा रहेगा।

और अगर मान लो कि कोई ग़रीब आदमी ऐसा है जिसके रिश्तेदारों में कोई मालदार नहीं है तो ऐसे अज्नबी ग़रीब का हक़ भी मालदारों के माल में है, ऊपर की दोनों आयतों में रिश्तेदार का हक़ देने का‌ हुक्म देने के बाद आगे मिस्कीनों (ग़रीबों) को देने का हुक्म दिया है।

लिहाज़ा मालदारों पर फ़र्ज़ है कि वह हर ग़रीब की मदद और उस का तआवुन करें, वो ग़रीब चाहे अपना रिश्तेदार हो या अज्नबी।

और ग़रीबों की मदद करने से मालदार क़ियामत के दिन अल्लाह की पकड़ से भी बचेगा और दुनिया में उस के माल में बरकत भी होगी और वो कभी ग़रीब नहीं होगा।

शैख़ुल इस्लाम हज़रत मुफ़्ती मुहम्मद तक़ी उस्मानी साहब सूरह-ए-रुम वाली आयते करीमा की तफ़सीर में लिखते हैं:

“पिछली आयत में बताया गया था कि रिज़्क़ तमामतर अल्लाह तआला की अता है, इसलिए जो कुछ उसने अता फ़रमाया है वो उसी के हुक्म और हिदायत के मुताबिक़ ख़र्च होना चाहिए, लिहाज़ा इस में ग़रीबों मिस्कीनों और रिश्तेदारों के जो हुक़ूक़ अल्लाह तआला ने मुक़र्रर फ़रमाए हैं वह उनको देना ज़रूरी है, और देते वक़्त ये अंदेशा नहीं होना चाहिए कि इस से माल में कमी आ जाएगी, क्यूँकि जैसा कि पिछली आयत में फ़रमाया गया रिज़्क़ की कुशादगी और तंगी अल्लाह तआला ही के क़ब्ज़े में है वो तुम्हें हुक़ूक़ की अदाइगी के बाद महरूम नहीं फ़रमाएगा, चुनांचे आज तक नहीं देखा गया कि हुक़ूक़ अदा करने के नतीजे में कोई मुफ़्लिस (ग़रीब) हो गया हो। (आसान तर्जुमा-ए-क़ुरआन)

अख़ीर में मैं यही अर्ज़ करूँगा कि मालदारों को चाहिए कि वो अपने रिश्तेदारों में देखें अगर कोई ग़रीब और ज़रूरतमंद है तो उस की मदद का पूरा पूरा ख़्याल रखें, और इस इंतिज़ार में हरगिज़ न रहें कि वो ग़रीब रिश्तेदार मेरे सामने अपनी ज़रूरत रखे, अपनी परेशानी बताए तब मैं उस की मदद करूँगा; क्यूँकि बहुत से ग़रीब इतने ग़ैरत मंद होते हैं कि ग़ुर्बत की वजह से बड़ी सी बड़ी तक्लीफ़ और मुसीबत बर्दाश्त कर लेते हैं लेकिन अपनी परेशानी बताकर किसी से मदद नहीं मांगते हैं। इसी लिए ग़रीबों को मांगने का हुक्म नहीं दिया गया है ताकि उन की इज़्ज़त और ग़ैरत महफ़ूज़ रहे; बल्कि मालदारों को देने का हुक्म दिया गया है।

एक साहब मेरे पास बैठे अपने किसी रिश्तेदार से फ़ोन पर बात कर रहे थे और कह रहे थे कि कोई ज़रूरत होगी तो बताना, फ़ोन रखने के बाद मुझ से कहने लगे कि ये मेरे रिश्तेदार हैं जो बहुत ग़रीब हैं, तो मैंने कहा कि फिर आप उनकी मदद कीजीए, इंतिज़ार न कीजिए कि वो अपनी ज़रूरत आप से बताएं, क्या पता उनको आप से अपनी ज़रूरत बताते हुए शर्म आती हो, इसलिए ख़ुद उनकी मदद कीजिए। उन की ग़ुर्बत ही उन की ज़रूरत है।

अल्लाह रब्बुल इज़्ज़तअमल की तौफ़ीक़ अता फ़रमाए।

16/ जुमादल आख़िरा 1444हि०
09/ जनवरी 2023 ई०
दिन सोमवार

مسلم‌ معاشرے میں غریبوں کی زندگی پُر سکون بنانے کے لیے اسلامی نظام

مسلم‌ معاشرے میں غریبوں کی زندگی پُر سکون بنانے کے لیے اسلامی نظام

🖊️ زین العابدین قاسمی
خادم جامعہ قاسمیہ اشرف العلوم نواب گنج علی آباد ضلع بہرائچ یوپی

قرآن کریم ایک ایسی کتاب ہے جس نے انسانوں کے پسماندہ، دبے کچلے اور غریب طبقہ کا بڑا خیال رکھا ہے، چنانچہ ان‌کی دنیوی زندگی کو پُر سکون اور راحت والی زندگی بنانے کے لیے مالداروں پر حقوق مقرر کرکے اُن کی ادائیگی کا حکم بھی دیا ہے۔

یہ اور بات ہے کہ مالداوں نے اُن حقوق کی ادائیگی کا جس طرح اہتمام کرنا چاہیے نہیں کیا جس کی وجہ سے آج مسلم معاشرے میں کتنے لوگ غربت کی وجہ سے پریشان رہتے ہیں، کوئی کھانے پہننے کا محتاج ہے، کسی کے پاس رہنے کے لیے مناسب مکان نہیں ہے، کوئی دوا علاج کے لیے پیسوں کا محتاج ہے، کوئی پیسوں کے نہ ہونے کی وجہ سے اپنے بچوں کو اچھی تعلیم نہیں دے پارہا ہے، کوئی پیسے نہ ہونے کی وجہ سے کاروبار نہیں کرپارہا ہے غرض غربت کی وجہ سے ایک غریب آدمی مختلف طریقوں سے پریشان رہتا ہے۔

جو آدمی غریب ہوتا ہے تو ایسا تو ہے نہیں کہ اُس کے سارے رشتے دار بھی غریب ہی ہوں۔ اگر ایک آدمی غریب ہے تو اس کے دسیوں رشتے دار مالدار بھی ہوتے ہیں۔

اب اُن مالداروں کو اللہ تعالیٰ نے قرآن کریم میں دو جگہ حکم دیا ہے کہ

”تم رشتے دار کو اُس کا حق دو“

ایک جگہ پندرہویں پارے میں سورۂ بنی اسرائیل کی چھبیسویں آیت میں حکم دیا:

وَاٰتِ ذَا الْقُرْبٰى حَقَّهٗ (اور تم رشتے دار کو اُس کا حق دو)

دوسری جگہ اکیسویں پارے میں سورۂ روم کی اڑتیسویں آیت میں حکم دیا:

فَاٰتِ ذَا الْقُرْبٰى حَقَّهٗ (لہٰذا تم رشتے دار کو اُس کا حق دو)

اِن‌دونوں آیاتِ کریمہ میں اللہ نے جس حق کو دینے کا حکم دیا ہے اُس سے مراد مالی حق ہے۔

یعنی اللہ تعالیٰ نے مالداروں کے مال میں اُن کے غریب رشتے داروں کا بھی حق رکھا ہے، اور پھر مالداروں کو یہ حکم بھی دیا ہے کہ غریب رشتے دار کو اس کا حق دو۔

اور یہ حق ایسا ہے جو ”حقوق العباد“ میں آتا ہے۔ اور حقوق العباد کا معاملہ ایسا ہے کہ جب تک حق والا معاف نہ کرے اللہ تعالیٰ بھی معاف نہیں فرمائیں گے۔ یعنی اگر مالدار اپنے مال میں سے اپنے غریب رشتے دار کو نہ دے تو وہ مالدار اتنا بڑا مجرم ہے کہ جب تک وہ غریب رشتے دار معاف نہ کرے اللہ تعالیٰ اس مالدار کو معاف نہیں فرمائیں گے، اور غریب رشتے دار کے حق کے برابر مالدار کی نیکیاں غریب کو دے دی جائیں گی، اور اگر مالدار کے پاس غریب کے حق کے برابر نیکیاں نہیں ہوں گی تو غریب کے گناہ مالدار کے اوپر لاد دیا جائے گا۔

لہٰذا کوئی مالدار یہ نہ سمجھے کہ یہ میرا مال ہے، اور اس میں صرف میرا ہی حق ہے، میں جس طرح چاہوں خرچ کروں، نہیں، نہیں، یہ مال اللہ کا دیا ہوا ہے، اور اس کو اُسی طرح خرچ کرنا ہے جیسا اللہ نے حکم دیا ہے، اور اس‌مال میں اللہ نے جن جن کا حق رکھا ہے اُن کو دینا پڑے گا، اس مال میں اللہ نے غریب رشتے دار کا بھی حق رکھا ہے، اس لیے اپنے مال میں سے غریب رشتے دار کو دینا ہوگا۔

یہاں ایک اور بات غور کرنے کی ہے کہ مالداروں کے مال میں غریب رشتے دار کا حق ہے مگر غریب رشتے دار کو یہ حکم نہیں دیا گیا ہے کہ مالدار رشتے داروں کے پاس جاکر اپنا حق مانگے؛ بلکہ مالداروں کو حکم دیا گیا ہے کہ تم اپنے غریب رشتے دار کو اس کا حق دو۔ لہٰذا مالداروں کی یہ ذمہ داری ہے کہ وہ اپنے غریب رشتے دار تک اس کا حق پہنچائیں، مالدار اِس انتظار میں ہرگز نہ رہیں کہ غریب رشتے دار مانگنے آئے تب اس کو دیں گے؛ بلکہ غریب رشتے دار آئے یا نہ آئے مالدار خود اُس کا حق اُس تک پہنچائے۔ کیوں کہ غریب رشتے دار کو اپنا حق مانگنے کا حکم نہیں ہے بلکہ مالداروں کو حکم ہے کہ وہ غریب رشتے دار کا حق اس کو دیں۔

اسی لیے اگر غریب اپنے مالدار رشتے داروں کے پاس اپنا حق مانگنے نہ جائے اور غربت میں زندگی گذار کر چلا جائے تو قیامت کے دن اس سے یہ پوچھ گچھ نہیں ہوگی کہ تم اپنے مالدار رشتے دار کے پاس اپنا حق مانگنے کیوں نہیں گئے تھے؛ لیکن اگر مالدار اپنے غریب رشتے دار کو اس کا حق نہ دے اور وہ غربت کی زندگی میں پریشان رہے تو قیامت کے دن مالدار سے پوچھ گچھ ہوگی کہ تم‌نے اپنے غریب رشتے دار کا حق کیوں نہیں ادا کیا تھا؟

اب اگر قرآن کریم کے اِس حکم پر عمل کرتے ہوئے ہر مالدار اپنے غریب رشتے دار کو اُس کا حق دینے لگے، اور اُس کی ضروریات کا خیال رکھنے لگے تو معاشرے میں کوئی بھی غریب پریشان حال نہیں رہے گا؛ کیوں کہ ہر غریب آدمی کے دسیوں رشتے دار مالدار ہوتے ہیں، ہر مالدار تھوڑا تھوڑا بھی اپنے غریب رشتے دار کو دینے لگے تو اس کی پریشانیاں دور ہوجائیں گی، اس کی زندگی بھی پُر سکون بن جائے گی، اور در در کی ٹھوکریں کھانے اور گری ہوئی نظروں سے دیکھے جانے سے بھی بچا رہے گا۔

اور اگر مان لو کہ کوئی غریب آدمی ایسا ہے جس کے رشتے داروں میں کوئی مالدار نہیں ہے تو ایسے اجنبی غریب کا حق بھی مالداروں کے مال میں ہے، اوپر کی دونوں آیتوں میں رشتے دار کا حق دینے کا‌حکم دینے کے بعد آگے مسکینوں (غریبوں) کو دینے کا حکم دیا ہے۔

لہٰذا مالداروں پر فرض ہے کہ وہ ہر غریب کی مدد اور اس کا تعاون کریں، وہ غریب چاہے اپنا رشتے دار ہو یا اجنبی۔
 
اور غریبوں کی مدد کرنے سے مالدار قیامت کے دن اللہ کی پکڑ سے بھی بچے گا اور دنیا میں اس کے مال میں برکت بھی ہوگی اور وہ کبھی غریب نہیں ہوگا۔

شیخ الاسلام حضرت مفتی محمد تقی عثمانی صاحب سورۂ روم والی آیت کریمہ کی تفسیر میں لکھتے ہیں:

”پچھلی آیت میں بتایا گیا تھا کہ رزق تمام تر اللہ تعالیٰ کی عطا ہے، اس لیے جو کچھ اس نے عطا فرمایا ہے وہ اسی کے حکم اور ہدایت کے مطابق خرچ ہونا چاہیے، لہذا اس میں غریبوں مسکینوں اور رشتہ داروں کے جو حقوق اللہ تعالیٰ نے مقرر فرمائے ہیں وہ ان کو دینا ضروری ہے، اور دیتے وقت یہ اندیشہ نہیں ہونا چاہیے کہ اس سے مال میں کمی آجائے گی، کیونکہ جیسا کہ پچھلی آیت میں فرمایا گیا رزق کی کشادگی اور تنگی اللہ تعالیٰ ہی کے قبضے میں ہے وہ تمہیں حقوق کی ادائیگی کے بعد محروم نہیں فرمائے گا، چنانچہ آج تک نہیں دیکھا گیا کہ حقوق ادا کرنے کے نتیجے میں کوئی مفلس (غریب) ہوگیا ہو۔“ (آسان ترجمۂ قرآن)

اخیر میں میں یہی عرض کروں گا کہ مالداروں کو چاہیے کہ وہ اپنے رشتے داروں میں دیکھیں اگر کوئی غریب اور ضرورت مند ہے تو اس کی مدد کا پورا پورا خیال رکھیں، اور اِس انتظار میں ہرگز نہ رہیں کہ وہ غریب رشتے دار میرے سامنے اپنی ضرورت رکھے، اپنی پریشانی بتائے تب میں اُس کی مدد کروں گا؛ کیوں کہ بہت سے غریب اتنے غیرت مند ہوتے ہیں کہ غربت کی وجہ سے بڑی سی بڑی تکلیف اور مصیبت برداشت کرلیتے ہیں لیکن اپنی پریشانی بتاکر کسی سے مدد نہیں مانگتے ہیں۔ اسی لیے غریبوں کو مانگنے کا حکم نہیں دیا گیا ہے تاکہ اُن کی عزت اور غیرت محفوظ رہے؛ بلکہ مالداروں کو دینے کا حکم دیا گیا ہے۔

ایک صاحب میرے پاس بیٹھے اپنے کسی رشتے دار سے فون پر بات کررہے تھے اور کہہ رہے تھے کہ کوئی ضرورت ہوگی تو بتانا، فون رکھنے کے بعد مجھ سے کہنے لگے کہ یہ میرے رشتے دار ہیں جو بہت غریب ہیں، تو میں نے کہا کہ پھر آپ ان کی مدد کیجیے، انتظار نہ کیجیے کہ وہ اپنی ضرورت آپ سے بتائیں، کیا پتا ان کو آپ سے اپنی ضرورت بتاتے ہوئے شرم آتی ہو، اس لیے خود ان کی مدد کیجیے۔ اُن کی غربت ہی اُن کی ضرورت ہے۔

اللہ ربّ العزت عمل کی توفیق عطا فرمائے۔

۱۶/جمادی الآخرہ ۱۴۴۴؁ھ
۹/ جنوری ۲۰۲۳؁ء
روزِ دوشنبہ