Monday, December 4, 2023

हज 1445 हि०/2024 के लिए फ़ार्म भरने का एलान

हज 1445 हि0/2024 के लिए ऑनलाइन फ़ार्म भरना शुरू

इंतिज़ार की घड़ियाँ हुईं ख़त्म

हज कमेटी ऑफ़ इंडिया ने अपने ऑफ़िशियल वेबसाइट पर हज का फ़ार्म भरने के सिलसिले में एलान जारी कर दिया है।

इस एलान के मुताबिक़ हज के फ़ार्म 4/ दिसंबर से 20/ दिसंबर तक भरे जाएंगे।

हज का फ़ार्म वही लोग भर सकते हैं, जिन के पास्पोर्ट की समाप्ति तिथी 31 /जनवरी 2025 के बाद तक हो, लिहाज़ा जिनके पास्पोर्ट की मुद्दत इस से पहले ख़त्म हो रही हो वह अपना पास्पोर्ट पुन: जारी करवा लें।

इससाल भी तमाम हिन्दुस्तानी हाजियों की रिहाईश मक्का मुकर्रमा के अज़ीज़िया इलाक़े ही में रहेगी।

इससाल एक ग्रुप में ज़्यादा से ज़्यादा पाँच लोग हो सकते हैं।

फ़ार्म भरवाने के लिए यह चीज़ें होनी चाहिए:

1) मोबाइल नंबर
2) ईमेल आई डी (ये ज़रूरी नहीं है)
3) पास्पोर्ट (जिसकी समाप्ति तिथी 31 जनवरी 2025 के बाद तक हो)
4) एक फ़ोटो
5) बैंक पास बुक
6) ख़ून जांच की रिपोर्ट
7) कोरोना वैक्सीन की दोनों डोज़ की सर्टीफ़िकेट
8) वारिस की मुकम्मल तफ़सील (नाम, बाप का नाम, पता, मोबाइल नंबर, हाजी से उस का रिश्ता)
9) आधार नंबर (यह ज़रूरी नहीं है)
10) पैन कार्ड नंबर
नोट: बैंक पास बुक और पैन कार्ड नंबर ग्रुप के किसी एक फ़र्द का होना भी काफ़ी है।

फ़ार्म भरवाने के लिए मुझसे सम्पर्क कर सकते हैं।

ज़ैनुल आबिदीन क़ासमी
ख़ादिम जामिया क़ास्मिया अशरफ़ुल उलूम नवाबगंज अलियाबाद ज़िला बहराइच
9670660363

حج ۱۴۴۵ھ/2024 کے لیے فارم بھرنے کا اعلان

حج ۱۴۴۵ھ/2024 کے لیے آنلائن فارم بھرنا شروع

*انتظار کی گھڑیاں ہوئیں ختم*

حج کمیٹی آف انڈیا نے اپنے آفیشیل ویب سائٹ پر حج کا فارم بھرنے کے سلسلے میں اعلان شائع کردیا ہے۔

اِس اعلان کے مطابق حج کے فارم ۴/دسمبر سے ۲۰/ دسمبر تک بھرے جائیں گے۔

حج کا فارم وہی لوگ بھر سکتے ہیں، جن کے پاسپورٹ کی میعاد ۳۱/جنوری ۲۰۲۵ کے بعد تک ہو، لہٰذا جن کے پاسپورٹ کی مدت اِس سے پہلے ختم ہورہی ہو وہ اپنے پاسپورٹ کی تجدید کروالیں.

اِمسال بھی تمام ہندوستانی حاجیوں کی رہائش مکہ مکرمہ کے عزیزیہ علاقے ہی میں رہے گی۔

امسال  ایک گروپ میں زیادہ سے زیادہ پانچ لوگ ہوسکتے ہیں۔

فارم بھروانے کے لیے یہ چیزیں ہونی چاہیے:

۱) موبائل نمبر
۲) ای میل آئی ڈی  (یہ ضروری نہیں ہے)
۳) پاسپورٹ (جس کی میعاد ۳۱/ جنوری ۲۰۲۵ کے بعد تک ہو)
۴) ایک فوٹو
۵) بینک پاس بک
۶) خون جانچ کی رپورٹ
۷) کورونا ویکسین کی دونوں ڈوز کی سرٹیفیکیٹ
۸) وارث کی مکمل تفصیل (نام، والد کا نام، پتہ، موبائل نمبر، حاجی سے اس کا رشتہ)
۹) آدھار نمبر (یہ ضروری نہیں ہے)
۱۰) پین کارڈ نمبر 
نوٹ: بینک پاس بک اور پین کارڈ نمبر گروپ کے کسی ایک فرد کا ہونا بھی کافی ہے۔

فارم بھروانے کے لیے مجھ سے رابطہ کرسکتے ہیں، کوئی فیس نہیں پڑے گی۔

زین العابدین قاسمی
خادم جامعہ قاسمیہ اشرف العلوم نواب گنج علی آباد ضلع بہرائچ
9670660363

Sunday, December 3, 2023

हज 1445 हि०/2024


हज 1445 हि०/2024

हज 2024 की पॉलिसी तैयार हो चुकी है, हज कमेटी ऑफ़ इंडिया की ऑफिशियल वेबसाइट पर भी तब्दीलियाँ जारी हैं, उम्मीद की जा रही है कि दिसंबर 2023 के इसी पहले हफ़्ते में हज का फ़ार्म भरने का एलान आजाएगा

जो हज़रात आने वाले साल में हज के मुक़द्दस सफ़र पर जाना चाहते हैं वह यह 👇🏻 चीज़ें तैयार रखें:
1) पास्पोर्ट
2) कोरोना वैक्सीन सर्टीफ़िकेट
3) बैंक पास बुक
4) पैन कार्ड
5) ब्लड ग्रुप (ख़ून जांच की रिपोर्ट)

जिन लोगों का पास्पोर्ट नहीं बना है वो अभी बनवा सकते हैं, पास्पोर्ट बनने में एक से डेढ़ महीने का वक़्त लगता है, और फ़ार्म भरने का वक़्त भी लगभग डेढ़ दो महीने तक रहेगा इसलिए अभी पास्पोर्ट के लिए अप्लाई करवा लें!

पास्पोर्ट बनवाने के लिए सबसे आसान यह तीन आई डी होती हैं:
(1) आधार कार्ड (आधार कार्ड में मोबाइल नंबर लिंक होना ज़रूरी है)
(2) पैन कार्ड
(3) बैंक पास बुक

मुतअल्लिक़ा थाने में वेरीफाई के लिए तीन डॉक्यूमेंट्स देने पड़ते हैं:
(1) परिवार रजिस्टर की नक़ल (जो सेक्रेटरी से हासिल की जाती है)
(2) परिचय पत्र (जो प्रधान/चेयरमैन/वार्ड मेंबर/बी डी सी या सदस्य ज़िला पंचायत में से किसी के दस्तख़त के साथ प्रमाणित हो)
(2) बयान हलफ़ी (जो तहसील/कचेहरी के किसी वकील से बनवा लें)

हज का फ़ार्म भरवाने के लिए हम से संपर्क कर सकते हैं, फ़ार्म भरने से लेकर हज के लिए रवानगी तक मुकम्मल रहनुमाई करता रहूँगा।
इन शा अल्लाह 

ज़ैनुलआबिदीन क़ासमी
ख़ादिम जामिया क़ासमिया  अशरफ़ुल उलूम नवाबगंज अलियाबाद ज़िला बहराइच यू०पी
9670660363

حج ۱۴۴۵ھ/2024


حج ۱۴۴۵ھ/2024

حج 2024 کی پالیسی تیار ہوچکی ہے، حج کمیٹی  آف انڈیا کی آفیشیل ویب سائٹ پر بھی تبدیلیاں جاری ہیں، امید کی جارہی ہے کہ دسمبر 2023 کے اِسی پہلے ہفتے میں حج کا فارم بھرنے کا اعلان آجائے گا۔

جو حضرات آنے والے سال میں حج کے مقدس سفر پر جانا چاہتے ہیں وہ یہ 👇🏻 چیزیں تیار رکھیں!
۱) پاسپورٹ 
۲) کورونا ویکسین سرٹیفکیٹ
۳) بینک پاس بوک
۴) پین کارڈ
۵) بلڈ گروپ (خون جانچ کی رپورٹ

جن لوگوں کا پاسپورٹ نہیں بنا ہے وہ ابھی بنوا سکتے ہیں، پاسپورٹ بننے میں ایک سے ڈیڑھ مہینے کا وقت لگتا ہے، اور فارم بھرنے کا وقت بھی تقریباً ڈیرھ دو مہینے تک رہے گا اس لیے ابھی پاسپورٹ کے لیے اپلائی کروالیں!

پاسپورٹ بنوانے کے لیے سب سے آسان یہ تین آئی ڈی ہوتی ہیں:
(۱) آدھار کارڈ (آدھار کارڈ سے موبائل نمبر لنک ہونا ضروری ہے)
(۲) پین کارڈ
(۳) بینک پاس بوک

متعلقہ تھانے میں ویری فائی کے لیے تین ڈاکیومینٹس دینے پڑتے ہیں:
(۱) پریوار رجسٹر کی نقل (جو سیکریٹری سے حاصل کی جاتی ہے)
(۲) پریچے پتر (پہچان پتر جو پردھان/چئیرمین/وارڈ ممبر/بی ڈی سی یا ممبر ضلع پنچایت میں سے کسی کے دستخط سے تصدیق شدہ ہو)
(۳) بیان حلفی (جو تحصیل/کچہری کے کسی وکیل سے بنوالیں)

حج کا فارم بھروانے کے لیے ہم سے رابطہ کرسکتے ہیں، فارم بھرنے سے لے کر حج کے لیے روانگی تک مکمل رہنمائی کرتا رہوں گا۔ ان شاءاللہ

زین العابدین قاسمی
خادم جامعہ قاسمیہ اشرف العلوم نواب گنج علی آباد ضلع بہرائچ یو۔پی
9670660363

Tuesday, November 28, 2023

पड़ोसियों के साथ हुस्ने सुलूक

पड़ोसियों के साथ हुस्ने सुलूक

🖊️ ज़ैनुल आबिदीन क़ासमी
ख़ादिम जामिया क़ासमिया अशरफ़ुल उलूम नवाबगंज अलियाबाद ज़िला बहराइच

जमीअत उलमाए ज़िला बहराइच की हिदायत पर दिनांक 27/ नवंबर 2023 को नवाबगंज की हज्जिन मस्जिद में बाद नमाज़े इशा इस्लाहे मुआशरा का प्रोग्राम मुनअक़िद हुआ, प्रोग्राम का आग़ाज़ हज्जिन मस्जिद के इमाम हाफ़िज़ अब्दुल बासित साहब की तिलावते क़ुरआने करीम से हुआ, उस के बाद राक़िमुस्सुतूर ज़ैनुल आबिदीन क़ासमी ने पड़ोसियों के हुक़ूक़ से मुतअल्लिक़ तफ़्सीली बयान किया।

क़ुरआन व हदीस की रोशनी में अर्ज़ किया कि पड़ोसियों के साथ अच्छा सुलूक करना और उन को किसी क़िस्म की तक्लीफ़ न पहुंचाना हर मुस्लमान पर ज़रूरी है, और पड़ोसियों की तीन किस्में हैं:(1) एक हक़ वाला पड़ोसी, यह ग़ैर मुस्लिम पड़ोसी है जिसका सिर्फ़ पड़ोसी होने का हक़ है। (2) दो हक़ वाला पड़ोसी, यह मुस्लमान पड़ोसी है जिसका एक हक़ पड़ोसी होने का और एक हक़ मुस्लमान होने का है। (3) तीन हक़ वाला पड़ोसी, यह रिश्तेदार मुस्लमान पड़ोसी है जिसका एक हक़ पड़ोसी होने का, एक हक़ मुस्लमान होने का और एक हक़ रिश्तेदार होने का है। हर क़िस्म के पड़ोसी के साथ अच्छा बर्ताव करने का इस्लाम ने हुक्म दिया है, अगर हर मुस्लमान अपने अपने पड़ोसी का ख़्याल करने लगे और उस को कोई तक्लीफ़ पहुंचाने के बजाए आराम पहुंचाने का एहतिमाम करने लगे तो हमारा मुआशरा एक अच्छा और बेहतरीन मुआशरा बन सकता है। नबीए करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने अपनी उम्मत को जो हिदायात और तालीमात दी हैं अगर आपकी उम्मत उन पर अमल करने लगे तो किसी को किसी से कोई तक्लीफ़ और शिकायत नहीं हो सकती है।

आज हम पड़ोसियों के सिलसिले में बहुत कोताही करते हैं, और पड़ोसियों के हुक़ूक़ को मामूली समझते हैं जब्कि पड़ोसियों के हुक़ूक़ के सिलसिले में नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने बड़ी ताकीद फ़रमाई है, यहाँ तक कि फ़रमाया कि जो शख़्स अल्लाह और क़ियामत के दिन पर ईमान रखता है उस के लिए ज़रूरी है कि अपने पड़ोसी को तक्लीफ़ न पहुंचाए, और एक बार तीन मर्तबा अल्लाह की क़सम खा कर इरशाद फ़रमाया कि अल्लाह की क़सम! वो शख़्स मोमिन नहीं है, अल्लाह की क़सम! वो शख़्स मोमिन नहीं है, अल्लाह की क़सम! वो शख़्स मोमिन नहीं है। नबीए करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की हर बात सच्ची होती है, क्यूंकि आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की ज़ुबाने मुबारक से वही बात निकलती है जो अल्लाह चाहते हैं, इसलिए किसी बात को सच साबित करने के लिए क़सम खाने की ज़रूरत नहीं होती है फिर भी अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम क़सम खा कर कोई बात इरशाद फ़रमाएं तो समझो कि कोई बहुत अहम बात इरशाद फ़रमा रहे हैं जिसमें किसी क़िस्म की कोताही की गुंजाइश नहीं है, तो जब आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने एक बार नहीं तीन तीन बार क़सम खाकर इरशाद फ़रमाया कि वो शख़्स मोमिन नहीं है तो सहाब-ए-किराम रिज़वानुल्लाहि अलैहिम अजमईन ने पूछा: ऐ अल्लाह के रसूल! आप किस के बारे में फ़रमा रहे हैं? तो आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया जिसका पड़ोसी उस की तक्लीफों से महफ़ूज़ न हो यानी जो शख़्स अपने पड़ोसी को तक्लीफ़ पहुँचाता हो उस को सताता हो उस के हुक़ूक़ का ख़्याल न रखता हो वह शख़्स सच्चा और पक्का मोमिन नहीं है, एक बार आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फ़रमाया वह शख़्स जन्नत में दाख़िल नहीं होगा जिसकी तक्लीफों से उस का पड़ोसी महफ़ूज़ न हो। कितनी सख़्त वईद है कि जो शख़्स अपने पड़ोसी को सताता हो वो जन्नत में जाने से महरूम रह जाएगा। इन अहादीस की रोशनी में हम सबको चाहिए कि हमारी किसी हरकत या किसी अमल से हमारे पड़ोसी को कोई तक्लीफ़ न पहुंचने पाए, यहाँ तक कि हम अपने घर के बाहर जनरेटर भी इस तरह न चलाऐं कि हम तो रात-भर आराम से सोते रहें और हमारा पड़ोसी जनरेटर की आवाज़ से परेशान रहे, अपने घर के सामने झाड़ू लगा कर कूड़ा पड़ोसी के घर की तरफ़ न फ़ेंकें, नाली साफ़ करके कचरे का ढेर ऐसी जगह न लगाऐं कि पड़ोसी को आने जाने में दिक़्क़त हो या कचरे की बदबू पड़ोसी के घर तक जाये, अपना मकान बनाते वक़्त भी इस बात का ख़्याल रखें कि आपकी दीवार से पड़ोसी के घर में हवा या रोशनी बंद न हो, अपनी छत पर इतनी ऊंची दीवार ज़रूर उठाएं कि आपकी छत पर कोई जाए तो पड़ोसी का आँगन दिखाई न दे, क्या पता पड़ोसी के घर में कोई किस हाल में बैठा हो और आपकी नज़र पड़ जाये जिससे उस को तक्लीफ़ और नागवारी हो। ग़र्ज़ेकि हर ऐसा काम जिससे पड़ोसी को मामूली तक्लीफ़ फहुंचे या नागवार गुज़रे नहीं करना चाहिए, जो लोग पड़ोसियों को तक्लीफ़ न पहुंचाने का ख़्याल रखते हैं वो मामूली मामूली बातों पर भी बहुत तवज्जोह देते हैं, चुनांचे इमाम ग़ज़ाली रहिमहुल्ला ने अपनी किताब ईहयाउल उलूम में एक वाक़िया लिखा है कि एक शख़्स के घर में चूहे बहुत हो गए थे, तो चूहों से नजात पाने के लिए किसी ने मश्वरा दिया कि अपने घर में बिल्ली पाल लो बस बिल्ली के डर से सारे चूहे भाग जाऐंगे, तो उस शख़्स ने बिल्ली पालने से इसलिए इनकार कर दिया कि बिल्ली के डर से चूहे मेरे घर से तो निकल जाऐंगे लेकिन पड़ोसी के घर में चले जाएंगे और उस को सताएँगे इसलिए मैं यह नहीं चाहता कि मेरे किसी अमल से पड़ोसी को तक्लीफ़ हो। अल्लाहु अकबर!!! कैसे नेक लोग थे, एक हम हैं कि अपने आराम-ओ-राहत के लिए पड़ोसी का बिल्कुल ख़्याल नहीं करते हैं, जब्कि होना यह चाहिए कि पड़ोसी को आराम पहुंचाने के लिए ख़ुद तक्लीफ़ बर्दाश्त करलें, वैसे भी मज़हबे इस्लाम ने हर मौक़े पर अपने से ज़्यादा दूसरे का ख़्याल रखने की तालीम दी है।

पड़ोसियों को किसी भी क़िस्म की तक्लीफ़ नहीं पहुंचानी चाहिए, यहाँ तक कि ज़ुबान से भी पड़ोसी को कोई तक्लीफ़ देह बात नहीं कहनी चाहिए, सख़्त गुनाह है, एक मर्तबा नबीए करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की मज्लिस में एक सहाबी ने अर्ज़ किया कि ऐ अल्लाह के रसूल! एक औरत है जिसके बारे में बड़ा चर्चा है कि वो बहुत नमाज़ पढ़ती है, बहुत रोज़े रखती है, सदक़ा ख़ैरात भी बहुत करती है, मगर उस की आदत यह है कि वो अपनी ज़ुबान से अपने पड़ोसी को सताती है, तो ऐसी औरत के बारे में क्या हुक्म है? नबीए करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने साफ़ लफ़्ज़ों में इरशाद फ़रमाया: यह औरत दोज़ख़ में जाएगी। फिर उन्ही सहाबी ने अर्ज़ किया कि ऐ अल्लाह के रसूल! एक और औरत है जो रोज़े तो कम रखती है, नमाज़ भी कम पढ़ती है, सदक़ा ख़ैरात भी बहुत कम करती है, मगर उस की आदत यह है कि वो अपनी ज़ुबान से अपने पड़ोसी को तक्लीफ़ नहीं देती है तो ऐसी औरत के बारे में क्या हुक्म है? आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने साफ़ लफ़्ज़ों में इरशाद फ़रमाया: यह औरत जन्नत में जाएगी। इस हदीस से मालूम हुआ कि पड़ोसी को ज़ुबान से भी तक्लीफ़ पहुंचाना इतना बड़ा गुनाह है कि नमाज़, रोज़े और सदक़ा ख़ैरात होते हुए भी दोज़ख़ में जाना पड़ेगा। ज़ुबान से तक्लीफ़ देने का मतलब गाली देना, झूटी तोहमत लगाना, बुराई करना, ग़ीबत करना वग़ैरा जिससे पड़ोसी को तक्लीफ़ हो।

पड़ोसियों के साथ अच्छा बर्ताव करना और उनके हुक़ूक़ का अदा करना इतना ज़रूरी है कि नबीए करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम फ़रमाते हैं कि हज़रत जिब्रईल अलैहिस्सलाम हमेशा मुझे पड़ोसियों के साथ हुस्ने सुलूक करने की इतनी ताकीद करते थे कि मुझे यह ख़्याल होने लगा कि कहीं घर के अफ़राद के साथ पड़ोसियों को भी वरासत में हिस्सा देने का हुक्म न दे दें।

पड़ोसियों के हुक़ूक़ की तफ़्सील बयान करते हुए आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फ़रमाया: (1) जब आपका पड़ोसी बीमार हो जाए तो उस की देख रेख करो, यानी बीमार पड़ोसी को जिस चीज़ की ज़रूरत हो और आप वह ज़रूरत पूरी कर सकते हैं तो आप पर ज़रूरी है कि
उस की मदद करें, बीमार पड़ोसी के लिए दवा लाने वाला कोई न हो तो आप दवा लाकर दे दें, उस को डाक्टर के यहाँ या अस्पताल ले जाने की ज़रूरत हो तो आप अपनी गाड़ी से या गाड़ी का इंतिज़ाम करके उस को पहुंचाने में मदद करें, दवा इलाज के लिए उस के पास पैसे न हों तो आप उस के लिए पैसों का इंतिज़ाम करें, आप ख़ुद डाक्टर हों तो बीमार पड़ोसी की हैसियत के मुताबिक़ उस का मुफ़्त इलाज करें या कम पैसों में इलाज करें। (2) अगर पड़ोसी का इंतिक़ाल हो जाए तो उस के जनाज़े में शरीक हों। (3) अगर पड़ोसी किसी ज़रूरत के लिए आप से क़र्ज़ मांगे तो उस को क़र्ज़ दें। और ये क़र्ज़ बग़ैर सूद के दें, जितना दें उस से ज़्यादा हरगिज़ न लें, हाँ उस की हैसियत के मुताबिक़ पूरा क़र्ज़ माफ़ कर दें या कुछ क़र्ज़ माफ़ कर दें, यानी अगर पड़ोसी ग़रीब हो क़र्ज़ अदा करने की ताक़त न रखता हो तो पूरा क़र्ज़ माफ़ कर दें या वो जितना अदा कर सकता हो उतना ले लें बाक़ी माफ़ कर दें। (4) अगर पड़ोसी किसी मुसीबत में गिरफ़्तार हो जाए तो उस की ख़बर-गीरी करो, यानी उस की मुसीबत दूर करने की पूरी कोशिश करो, जैसे आपके पड़ोसी पर कोई ज़ुल्म कर रहा है, उस को नाहक़ सता रहा है, तो आप उस को ज़ालिम के ज़ुल्म से बचाने में मदद करो, किसी ने आपके पड़ोसी पर नाहक़ मुक़द्दमा कर दिया तो आपसे जो हो सके उस की मदद करो, आपका पड़ोसी किसी का क़र्ज़दार है और क़र्ज़ की अदायगी के लिए उस के पास इंतिज़ाम नहीं है, और क़र्ज़ख़्वाह परेशान कर रहा है तो आप उस की क़र्ज़ की अदायगी में मदद करें, आप के पड़ोसी के घर में किसी का इन्तिक़ाल हो जाए तो उस के घर आए हुए मेहमानों और उस के बच्चों के लिए खाने पीने का इन्तिज़ाम करें, ग़र्ज़ेकि आपका पड़ोसी जिस क़िस्म की मुसीबत में गिरफ़्तार हो तो आप हर मुम्किन उस का तआवुन करें। (5) आपके पड़ोसी से कोई ग़लती हो जाए तो पर्दापोशी करो, यानी आपका पड़ोसी कोई ग़लत काम कर बैठे तो पूरे मुहल्ले और मुआशरे में उस को बदनाम न करो, लोगों से बताते न फिरो बल्कि उस पर पर्दा डाल दो और यह समझो कि कुछ हुवा ही नहीं है। अफ़्सोस सोता उस है कि आज किसी को बदनाम करने वाला पहला शख़्स उस का पड़ोसी ही होता है। (6) आपके घर में सालन बने तो इस तरह बनाओ कि सालन की ख़ुशबू पड़ोसी के घर तक न पहुंचे, और अगर सालन की ख़ुशबू पड़ोसी के घर पहुंच रही हो तो उस के घर सालन ज़रूर भेजो ताकि उस के बच्चों को आपके सालन की ख़ुशबू से तक्लीफ़ न हो।

पड़ोसियों के दर्मियान मुहब्बत और तअल्लुक़ क़ायम रखने के लिए नबीए करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने एक दूसरे को हदया व तोहफ़ा देने का हुक्म देते हुए फ़रमाया कि अगर आपके घर में सालन बन रहा हो तो शोरबा ज़्यादा कर दो और थोड़ा सा सालन पड़ोसी के घर भी भेज दो, और यह सालन सिर्फ़ एक मिसाल है, मतलब यह है कि आपके घर में जब भी कोई अच्छी चीज़ बने तो थोड़ा सा पड़ोसी के घर भी भेज दो, एक हदीस से मालूम होता है कि पड़ोसी के घर भेजने के लिए कोई क़ीमती चीज होना ही जरूरी नहीं है बल्कि मामूली चीज भी भेजी जा सकती है लिहाज़ा अगर कोई औरत अपनी पड़ोसन औरत के घर कोई मामूली चीज़ भेजे तो उसको हक़ीर न समझे बल्कि खुशदिली से उसको क़बूल कर ले, इस तरह एक दूसरे के घर चीज़ें भेजने से आपस में मुहब्बत बढ़ती है, तअल्लुक़ात मज़्बूत होते हैं, एक दूसरे के दिल में हमदर्दी पैदा होती है।

पड़ोसी के दुख-दर्द का ख़्याल न रखने वाले के बारे में आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फ़रमाया कि वह शख़्स मोमिन नहीं है जो ख़ुद तो पेट भर खाए और उस का पड़ोसी भूका रहे। यहाँ भी खाना और भूक सिर्फ एक मिसाल है, मतलब यह है कि आपके पास ज़रूरियाते ज़िंदगी की ऐसी चीज़ें हैं जिनसे आपका पड़ोसी महरूम है तो अपने में से कुछ पड़ोसी के लिए भी इंतिज़ाम कर दें, मसलन: पड़ोसी के पास खाने का इंतिज़ाम नहीं है तो आप उस के घर खाना भेज दें, पहेनने के लिए कपड़ों का मोहताज है तो आप उस के लिए कपड़ों का इंतिज़ाम कर दें, जाड़े के मौसम में गर्म कपड़ों या लिहाफ़ और चादर वग़ैरा की उस को ज़रूरत हो तो आप उस का इंतिज़ाम कर दें, ऐसा ना हो कि आप गर्म गर्म बिस्तरों में रात-भर आराम से सोते रहें और आपका पड़ोसी रात-भर जाड़े में ठिठुरता रहे और सो भी न पाए, इसी तरह आपके घर में गर्म पानी का इंतिज़ाम हो तो पड़ोसी के घर में थोड़ा गर्म पानी भेज दिया करें ताकि उस के बच्चे भी ठंडक में गर्म पानी से नहा सकें, ऐसे ही गर्मी के मौसम में आपके घर फ़्रीज है तो दो एक बोतल ठंडा पानी पड़ोसी के घर भी भेज दें ताकि वह भी ठंडा पानी पी सके। ग़र्ज़ेकि पड़ोसी का हर तरह से ख़्याल रखना चाहिए।

पड़ोसी के साथ अच्छा सुलूक करना और उस को तक्लीफ़ न पहुंचाना यह इतना अहम है कि नबीए करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इन्सान के अच्छा और बुरा होने का मदार इसी को बना दिया‌। चुनांचे एक-बार एक शख़्स ने नबीए करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से पूछा कि ऐ अल्लाह के रसूल! मुझे कैसे मालूम हो कि मैं अच्छा हूँ या बुरा हूँ? तो आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया कि जब तुम सुनो कि तुम्हारा पड़ोसी तुम्हारी तारीफ़ कर रहा है और कह रहा है कि तुम अच्छे हो तो वाक़ई तुम अच्छे हो, और जब तुम सुनो कि तुम्हारा पड़ोसी तुम्हारे बारे में कह रहा है कि तुम बुरे हो तो वाक़ई तुम बुरे हो। ज़ाहिर सी बात है कि जब हम अपने पड़ोसी के साथ अच्छा बर्ताव करेंगे तो वो हमारी तारीफ़ ही करेगा, और जब उस के साथ बुरा सुलूक करेंगे तो वो हम को बुरा ही कहेगा।

एक-बार अमीरुल मोमिनीन हज़रत उमर रज़ियल्लाहु अन्हु की ख़िदमत में एक मुक़द्दमा आया, इस मुक़द्दमे के दो गवाह पेश किए गए, एक गवाह के बारे हज़रत उमर रज़ियल्लाहु अन्हु जानते थे कि इस की गवाही काबिले क़बूल है, मगर दूसरे गवाह के बारे में मालूम नहीं था कि वह कैसा है? तो हाज़िरीन से पूछा कि कोई शख़्स इस के अच्छा या बुरा होने को जानता है? तो एक शख़्स ने खड़े हो कर कहा कि हाँ मैं जानता हूँ यह शख़्स अच्छा है। तो अमीरुल मोमिनीन ने पूछा कि तुमको कैसे मालूम कि ये अच्छा शख़्स है क्या तुम उस के पड़ोसी हो? या तुमने कभी उस के साथ सफ़र किया है? उस शख़्स ने कहा कि जी नहीं न मैं इस का पड़ोसी हूँ न मैंने इस के साथ सफ़र किया है। तो अमीरुल मोमिनीन ने फ़रमाया कि लगता है तुमने इस आदमी को मस्जिद से निकलते हुए देखा है और इसी लिए फ़ैसला कर दिया कि यह अच्छा आदमी है? अमीरुल मोमिनीन हज़रत उमर रज़ियल्लाहु अन्हु के फ़रमान का मतलब यह था कि कोई शख़्स सिर्फ़ मस्जिद से नमाज़ पढ़ कर निकलने से अच्छा आदमी नहीं हो जाता है बल्कि ज़रूरी है कि वो अपने पड़ोसी के साथ अच्छा सुलूक करे और उस के पड़ोसी उस के अच्छा होने की गवाही दें। वर्ना नमाज़, रोज़ा, ज़कात और हज वग़ैरा इबादात का एहतिमाम करने के बावजूद हम अच्छे नहीं रहेंगे।
एक-बार नबीए करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फ़रमाया कि अल्लाह के नज़्दीक बेहतरीन पड़ोसी वह है जो अपने पड़ोसी के साथ अच्छा सुलूक करता हो। इन तमाम अहादीस से नबीए करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम अपनी उम्मत को यही सिखा रहे हैं कि हर मोमिन अपने पड़ोसी के साथ अच्छा सुलूक करे और उस को किसी क़िस्म की तक्लीफ़ न पहुंचने दे।

वाज़ेह रहे कि एक पड़ोसी तो वह है जो मुस्तक़िल पड़ोसी है यानी जो आपके घर का पड़ोसी है और एक पड़ोसी वह भी है जो कुछ देर के लिए आपका पड़ोसी बना है, जैसे आप बस, ट्रेन या हवाई जहाज़ में सफ़र कर रहे हों और आपके बग़ल में कोई बैठा हो या आप मस्जिद, या किसी दीनी-ओ-दुनियावी मज्लिस या जलसों में हों और आपके बग़ल में कोई बैठा हो वो भी थोड़ी देर ही के लिए सही लेकिन आपका पड़ोसी है उस के साथ भी अच्छा सुलूक करने का क़ुरआने करीम ने हुक्म दिया है, लिहाज़ा ऐसे पड़ोसी को भी आराम पहुंचाने का ख़्याल रखना चाहिए और हर ऐसे काम से बचना चाहिए जिससे इस बग़ल वाले पड़ोसी को तक्लीफ़ पहुंचे, जैसे बीड़ी या सिगरेट के धोएं से इसी तरह आपके गुटखा वग़ैरा खाने से उस को तक्लीफ़ हो रही हो तो हरगिज़ ऐसी चीज़ों का इस्तिमाल न करें।

आख़िर में दरख़्वास्त की कि जो बातें अर्ज़ की गई हैं उन पर हम लोग ज़रूर अमल करें, अगर हम सब लोग अपने अपने पड़ोसी का ख़्याल करने लगें तो न हमसे किसी को तक्लीफ़ पहुंचे और न हमको किसी से तक्लीफ़ पहुंचे, इस तरह हमारा मुआशरा एक बेहतरीन और ख़ुश्गवार मुआशरा बन सकता है।

फिर दुआ पर प्रोग्राम का इख़्तिताम हुआ।

इस प्रोग्राम में काफ़ी लोग मौजूद थे, क़स्बा के मुअज़्ज़ज़ लोगों के साथ साथ नौजवानों की एक बड़ी तादाद मौजूद थी।

پڑوسیوں کے ساتھ حُسنِ سلوک

پڑوسیوں کے ساتھ حُسنِ سلوک

🖊️ زین العابدین قاسمی
خادم جامعہ قاسمیہ اشرف العلوم نواب گنج علی آباد ضلع بہرائچ

جمعیۃ علمائے ضلع بہرائچ کی ہدایت پر مؤرخہ ۲۷/ فروری ۲۰۲۳؁ء کو نواب گنج علی آباد کی حجن مسجد میں بعد نمازِ عشاء اصلاح معاشرہ کا پروگرام منعقد ہوا، پروگرام کا آغاز حجن مسجد کے امام حافظ عبدالباسط صاحب کی تلاوتِ قرآن کریم سے ہوا، اس کے بعد راقم السُّطور زین العابدین قاسمی نے پڑوسیوں کے حقوق سے متعلق تفصیلی بیان کیا۔

قرآن و حدیث کی روشنی میں عرض کیا کہ پڑوسیوں کے ساتھ اچھا سلوک کرنا اور اُن کو کسی قسم کی تکلیف نہ پہنچانا ہر مسلمان پر ضروری ہے، اور پڑوسیوں کی تین قسمیں ہیں: (۱) ایک حق والا پڑوسی، یہ غیرمسلم پڑوسی ہے جس کا صرف پڑوسی ہونے کا حق ہے (۲) دو حق والا پڑوسی، یہ مسلمان پڑوسی ہے جس کا ایک حق پڑوسی ہونے کا اور ایک حق مسلمان ہونے کا ہے (۳) تین حق والا پڑوسی، یہ رشتے دار مسلمان پڑوسی ہے جس کا ایک حق پڑوسی ہونے کا، ایک حق مسلمان ہونے کا اور ایک حق رشتے دار ہونے کا ہے۔ ہر قسم کے پڑوسی کے ساتھ اچھا برتاؤ کرنے کا اسلام نے حکم دیا ہے، اگر ہر مسلمان اپنے اپنے پڑوسی کا خیال کرنے لگے اور اس کو کوئی تکلیف پہنچانے کے بجائے آرام پہنچانے کا اہتمام کرنے لگے تو ہمارا معاشرہ ایک اچھا اور بہترین معاشرہ بن سکتا ہے۔ نبی کریم ﷺ نے اپنی امت کو جو ہدایات اور تعلیمات دی ہیں اگر آپ کی امت اُن پر عمل کرنے لگے تو کسی کو کسی سے کوئی تکلیف اور شکایت نہیں ہوسکتی ہے۔

آج ہم پڑوسیوں کے سلسلے میں بہت کوتاہی کرتے ہیں، اور پڑوسیوں کے حقوق کو معمولی سمجھتے ہیں جب کہ پڑوسیوں کے حقوق کے سلسلے میں نبی کریم ﷺ نے بڑی تاکید فرمائی ہے، یہاں تک کہ فرمایا کہ جو شخص اللہ اور قیامت کے دن پر ایمان رکھتا ہے اس کے لیے ضروری ہے کہ اپنے پڑوسی کو تکلیف نہ پہنچائے، اور ایک بار تین مرتبہ اللہ کی قسم کھا کر ارشاد فرمایا کہ اللہ کی قسم! وہ شخص مؤمن نہیں ہے، اللہ کی قسم! وہ شخص مؤمن نہیں ہے، اللہ کی قسم! وہ شخص مؤمن نہیں ہے۔ نبی کریم ﷺ کی ہر بات سچی ہوتی ہے، کیوں کہ آپ ﷺ کی زبانِ مبارک سے وہی بات نکلتی ہے جو اللہ چاہتے ہیں، اس لیے کسی بات کو سچ ثابت کرنے کے لیے قسم کھانے کی ضرورت نہیں ہوتی ہے پھر بھی اللہ کے نبی ﷺ قسم کھا کر کوئی بات ارشاد فرمائیں تو سمجھو کہ کوئی بہت اہم بات ارشاد فرمارہے ہیں جس میں کسی قسم کی کوتاہی کی گنجائش نہیں ہے، تو جب آپ ﷺ نے ایک بار نہیں تین تین بار قسم کھاکر ارشاد فرمایا کہ وہ شخص مؤمن نہیں ہے تو صحابۂ کرام رضوان اللہ علیہم اجمعین نے پوچھا: اے اللہ کے رسول! آپ کس کے بارے میں فرمارہے ہیں؟ تو آپ ﷺ نے فرمایا: جس کا پڑوسی اُس کی تکلیفوں سے محفوظ نہ ہو یعنی جو شخص اپنے پڑوسی کو تکلیف پہنچاتا ہو اس کو ستاتا ہو اس کے حقوق کا خیال نہ رکھتا ہو وہ شخص سچا اور پکا مؤمن نہیں ہے، ایک بار آپ ﷺ نے ارشاد فرمایا: وہ شخص جنت میں داخل نہیں ہوگا جس کی تکلیفوں سے اُس کا پڑوسی محفوظ نہ ہو۔ کتنی سخت وعید ہے کہ جو شخص اپنے پڑوسی کو ستاتا ہو وہ جنت میں جانے سے محروم رہ جائے گا۔ اِن احادیث کی روشنی میں ہم سب کو چاہیے کہ ہماری کسی حرکت یا کسی عمل سے ہمارے پڑوسی کو کوئی تکلیف نہ پہنچنے پائے، یہاں تک کہ ہم ہم اپنے گھر کے باہر جنریٹر بھی اِس طرح نہ چلائیں کہ ہم تو رات بھر آرام سے سوتے رہیں اور ہمارا پڑوسی جنریٹر کی آواز سے پریشان رہے، اپنے گھر کے سامنے جھاڑو لگا کر کوڑا پڑوسی کے گھر کی طرف نہ پھینکیں، نالی صاف کرکے کچرے کا ڈھیر ایسی جگہ نہ لگائیں کہ پڑوسی کو آنے جانے میں دقت ہو یا کچرے کی بدبو پڑوسی کے گھر تک جائے، اپنا مکان بناتے وقت بھی اِس بات کا خیال رکھیں کہ آپ کی دیوار سے پڑوسی کے گھر میں ہوا یا روشنی بند نہ ہو، اپنی چھت پر اتنی اونچی دیوار ضرور اٹھائیں کہ آپ کی چھت پر کوئی جائے تو پڑوسی کا آنگن دکھائی نہ دے، کیا پتا پڑوسی کے گھر میں کوئی کس حال میں بیٹھا ہو اور آپ کی نظر پڑ جائے جس سے اس کو تکلیف اور ناگواری ہو۔ غرضیکہ ہر ایسا کام جس سے پڑوسی کو معمولی تکلیف ہو یا ناگوار گذرے نہیں کرنا چاہیے، جو لوگ پڑوسیوں کو تکلیف نہ پہنچانے کا خیال رکھتے ہیں وہ معمولی معمولی باتوں پر بھی بہت توجہ دیتے ہیں، چنانچہ امام غزالی رحمہ اللہ نے اپنی کتاب اِحیاء العلوم میں ایک واقعہ لکھا ہے کہ ایک شخص کے گھر میں چوہے بہت ہوگیے تھے، تو چوہوں سے نجات پانے کے لیے کسی نے مشورہ دیا کہ اپنے گھر میں بلی پال لو بس بلی کے ڈر سے سارے چوہے بھاگ جائیں گے، تو اُس شخص نے بلی پالنے سےاس لیے انکار کردیا کہ بلی کے ڈر سے چوہے میرے گھر سےتو نکل جائیں گے لیکن پڑوسی کےگھر میں چلے جائیں گے اور اس کو ستائیں گے اس لیے میں یہ نہیں چاہتا کہ میرے کسی عمل سے پڑوسی کو تکلیف ہو۔ اللہ اکبر!!! کیسے نیک لوگ تھے، ایک ہم ہیں کہ اپنے آرام و راحت کے لیے پڑوسی کا بالکل خیال نہیں کرتے ہیں، جب کہ ہونا یہ چاہیے کہ پڑوسی کو آرام پہنچانے کے لیے خود تکلیف برداشت کرلیں، ویسے بھی مذہبِ اسلام نے ہر موقع پر اپنے سے زیادہ دوسرے کا خیال رکھنے کی تعلیم دی ہے۔

پڑوسیوں کو کسی بھی قسم کی تکلیف نہیں پہنچانی چاہیے، یہاں تک زبان سے بھی پڑوسی کو کوئی تکلیف دِہ بات نہیں کہنی چاہیے، سخت گناہ ہے، ایک مرتبہ نبی کریم ﷺ کی مجلس میں ایک صحابی نے عرض کیا کہ اے اللہ کے رسول! ایک عورت ہے جس کے بارے میں بڑا چرچا ہے کہ وہ بہت نماز پڑھتی ہے، بہت روزے رکھتی ہے، صدقہ خیرات بھی بہت کرتی ہے مگر اُس کی عادت یہ ہے کہ وہ اپنی زبان سے اپنے پڑوسی کو ستاتی ہے، تو ایسی عورت کے بارے میں کیا حکم ہے؟ نبی کریم ﷺ نے صاف لفظوں میں ارشاد فرمایا: یہ عورت دوزخ میں جائے گی۔ پھر انہی صحابی نے عرض کیا کہ اے اللہ کے رسول! ایک اور عورت ہے جو روزے تو کم رکھتی ہے، نماز بھی کم پڑھتی ہے، صدقہ خیرات بھی بہت کم کرتی ہے، مگر اس کی عادت یہ ہے کہ وہ اپنی زبان سے اپنی پڑوسی کو تکلیف نہیں دیتی ہے تو ایسی عورت کے بارے میں کیا حکم ہے؟ آپ ﷺ نے صاف لفظوں میں ارشاد فرمایا: یہ عورت جنت میں جائے گی۔ اِس حدیث سے معلوم ہوا کہ پڑوسی کو زبان سے بھی تکلیف پہنچانا اتنا بڑا گناہ ہے کہ نماز، روزے اور صدقہ خیرات ہوتے ہوئے بھی دوزخ میں جانا پڑے گا۔ زبان سے تکلیف دینے کا مطلب گالی دینا، جھوٹی تہمت لگانا، برائی کرنا، غیبت کرنا وغیرہ جس سے پڑوسی کو تکلیف ہو۔

پڑوسیوں کے ساتھ اچھا برتاؤ کرنا اور ان کے حقوق کا ادا کرنا اتنا ضروری ہے کہ نبی کریم ﷺ فرماتے ہیں کہ حضرت جبرئیل علیہ السلام ہمیشہ مجھے پڑوسیوں کے ساتھ حُسنِ سلوک کرنے کی اتنی تاکید کرتے تھے کہ مجھے یہ خیال ہونے لگا کہ کہیں گھر کے افراد کےساتھ پڑوسیوں کو بھی وراثت میں حصہ دینے کا حکم نہ دیدیں۔ 

پڑوسیوں کے حقوق کی تفصیل بیان کرتے ہوئے آپ ﷺ نے ارشاد فرمایا: (۱) جب آپ کا پڑوسی بیمار ہوجائے تو اس کی دیکھ ریکھ کرو۔ یعنی بیمار پڑوسی کو جس چیز کی ضرورت ہو اور آپ وہ ضرورت پوری کرسکتے ہوں تو آپ پر ضروری ہے کہ اس کی مدد کریں، بیمار پڑوسی کے لیے دوا لانے والا کوئی نہ ہو تو آپ دوا لاکر دے دیں، اس کو ڈاکٹر کے یہاں یا اسپتال لے جانے کی ضرورت ہو تو آپ اپنی گاڑی سے یا گاڑی کا انتظام کرکے اس کو پہنچانے میں مدد کریں۔ دوا علاج کے لیے اس کے پاس پیسے نہ ہوں تو آپ اس کے لیے پیسوں کا انتظام کریں، آپ خود ڈاکٹر ہوں تو بیمار پڑوسی کی حیثیت کے مطابق اُس کا مفت علاج کریں یا کم پیسوں میں کریں۔ (۲) اگر پڑوسی کا انتقال ہوجائے تو اس کے جنازے میں شریک ہوں۔ (۳) اگر پڑوسی کسی ضرورت کے لیے آپ سے قرض مانگے تو اس کو قرض دیں۔ اور یہ قرض بغیر سود کے دیں، جتنا دیں اُس سے زیادہ ہرگز نہ لیں، ہاں اُس کی حیثیت کے مطابق پورا قرض معاف کردیں یا کچھ قرض معاف کردیں، یعنی اگر پڑوسی غریب ہو قرض ادا کرنے کی طاقت نہ رکھتا ہو تو پورا قرض معاف کردیں یا وہ جتنا ادا کرسکتا ہو اُتنا لے لیں باقی معاف کردیں۔ (۴) اگر پڑوسی کسی مصیبت میں گرفتار ہوجائے تو اس کی خبر گیری کرو‌۔ یعنی اس کی مصیبت دور کرنے کی پوری کوشش کرو، جیسے آپ کے پڑوسی پر کوئی ظلم کررہا ہے، اُس کو ناحق ستارہا ہے، تو آپ اُس کو ظالم کے ظلم سے بچانے میں مدد کرو، کسی نے آپ کے پڑوسی پر ناحق مقدمہ کردیا تو آپ سے جو ہوسکے اس کی مدد کرو، آپ کا پڑوسی کسی کا قرض دار ہے اور قرض کی ادائیگی کے لیے اس کے پاس انتظام نہیں ہے، اور قرض خواہ پریشان کررہا ہے تو آپ اس کی قرض کی ادائیگی میں مدد کریں، آپ کے پڑوسی کے گھر کسی کا انتقال ہوجائے تو اس کے یہاں آئے ہوئے مہمانوں اور اس کے بچوں کے کھانے پینے کا انتظام کردیں، غرضیکہ آپ کا پڑوسی جس قسم کی مصیبت میں گرفتار ہو تو آپ ہرممکن اس کا تعاون کریں۔ (۵) آپ کے پڑوسی سے کوئی غلطی ہوجائے تو پردہ پوشی کرو۔ یعنی آپ کا پڑوسی کوئی غلط کام کربیٹھے تو پورے محلے اور معاشرے میں اس کو بدنام نہ کرو، لوگوں سے بتاتے نہ پھرو بلکہ اس پر پردہ ڈال دو اور یہ سمجھو کہ کچھ ہوا ہی نہیں ہے۔ افسوس ہوتا ہے کہ آج کسی کو بدنام کرنے والا پہلا شخص اُس کا پڑوسی ہی ہوتا ہے۔ (۶) آپ کے گھر میں سالن بنے تو اِس طرح بناؤ کہ سالن کی خوشبو پڑوسی کے گھر تک نہ پہنچے، اور اگر سالن کی خوشبو پڑوسی کے گھر پہنچ رہی ہو تو اُس کے گھر سالن ضرور بھیجو تاکہ اُس کے بچوں کو آپ کے سالن کی خوشبو سے تکلیف نہ ہو۔

پڑوسیوں کے درمیان محبت اور تعلق قائم رکھنے کے لیے نبی کریم ﷺ نے ایک دوسرے کو ہدیہ و تحفہ دینے کا حکم دیتے ہوئے فرمایا کہ اگر آپ کے گھر میں سالن بن رہا ہو تو شوربا زیادہ کردو اور تھوڑا سا سالن پڑوسی کے گھر بھی بھیج دو، اور یہ سالن صرف ایک مثال ہے، مطلب یہ ہے کہ آپ کے گھر میں جب بھی کوئی اچھی چیز بنے تو تھوڑا سا پڑوسی کے گھر بھی بھیج دو، ایک حدیث سے معلوم ہوتا ہے کہ پڑوسی کے گھر بھیجنے کےلیے کوئی زیادہ قیمتی چیز ہی ہونا ضروری نہیں ہے، معمولی چیزیں بھی بھیج دینی چاہیے، اگر کوئی عورت اپنی پڑوسن عورت کے گھر کوئی معمولی چیز بھیجے تو اُس کو حقیر نگاہ سے نہ دیکھے بلکہ خوش دلی سے قبول کرلے، اِس طرح ایک دوسرے کے گھر چیزیں بھیجنے سے آپس میں محبت بڑھتی ہے، تعلقات مضبوط ہوتے ہیں، ایک دوسرے کے دل میں ہمدردی پیدا ہوتی ہے۔

پڑوسی کے دکھ درد کا خیال نہ رکھنے والے کے بارے میں آپ ﷺ نے ارشاد فرمایا کہ وہ شخص مؤمن نہیں ہے جو خود تو پیٹ بھر کھائے اور اُس کا پڑوسی بھوکا رہے۔ یہاں بھی کھانا اور بھوک صرف ایک مثال ہے، مطلب یہ ہے کہ آپ کے پاس ضروریاتِ زندگی کی ایسی چیزیں ہیں جن سے آپ کا پڑوسی محروم ہے تو اپنے میں سے کچھ پڑوسی کے لیے بھی انتظام کردیں، مثلاً: پڑوسی کے پاس کھانے کا انتظام نہیں ہے تو آپ اس کے گھر کھانا بھیج دیں، پہننے کے لیے وہ کپڑوں کا محتاج ہے تو آپ اُس کے لیے کپڑوں کا انتظام کردیں، جاڑے کے موسم میں گرم کپڑوں یا لحاف اور چادر وغیرہ کی اس کو ضرورت ہو تو آپ اس کا انتظام کردیں، ایسا نہ ہو کہ آپ گرم گرم بستروں میں رات بھر آرام سے سوتے رہیں اور آپ کا پڑوسی رات بھر جاڑے میں ٹھٹھرتا رہے اور سو بھی نہ پائے، اسی طرح آپ کے گھر میں گرم پانی کا انتظام ہو تو پڑوسی کے گھر میں تھوڑا گرم پانی بھیج دیا کریں تاکہ اُس کے بچے بھی ٹھنڈک میں گرم پانی سے نہاسکیں، ایسے ہی گرمی کے موسم میں آپ کے گھر فریج ہے تو دو ایک بوتل ٹھنڈا پانی پڑوسی کے گھر بھی بھیج دیں تاکہ وہ بھی ٹھنڈا پانی پی سکے۔ غرضیکہ پڑوسی کا ہر طرح سے خیال رکھنا چاہیے۔

پڑوسی کے ساتھ اچھا سلوک کرنا اور اس کو تکلیف نہ پہنچانا یہ اِتنا اہم ہے کہ نبی کریم ﷺ نے انسان کے اچھا اور برا ہونے کا مدار اسی کو بنادیا۔‌ چنانچہ ایک بار ایک شخص نے نبی کریم ﷺ سے پوچھا کہ اے اللہ کے رسول! مجھے کیسے معلوم ہو کہ میں اچھا ہوں یا برا ہوں؟ تو آپ ﷺ نے فرمایا کہ جب تم سنو کہ تمھارا پڑوسی تمھاری تعریف کررہا ہے اور کہہ رہا ہے کہ تم اچھے ہو تو واقعی تم اچھے ہو، اور جب تم سنو کہ تمھارا پڑوسی تمھارے بارے میں کہہ رہا ہے کہ تم برے ہو تو واقعی تم برے ہو۔ ظاہر سی بات ہے کہ جب ہم اپنے پڑوسی کے ساتھ اچھا برتاؤ کریں گے تو وہ ہماری تعریف ہی کرے گا، اور جب اُس کے ساتھ برا سلوک کریں گے تو وہ ہم کو برا ہی کہے گا۔

ایک بار امیر المومنین حضرت عمر رضی اللہ عنہ کی خدمت میں ایک مقدمہ آیا، اُس مقدمے کے دو گواہ پیش کیے گئے، ایک گواہ کے بارے میں حضرت عمر رضی اللہ عنہ جانتے تھے کہ اس کی گواہی قابلِ قبول ہے، مگر دوسرے گواہ کے بارے میں معلوم نہیں تھا کہ وہ کیسا ہے؟ تو حاضرین سے پوچھا کہ کوئی شخص اس کے اچھا یا برا ہونے کو جانتا ہے؟ تو ایک شخص نے کھڑے ہوکر کہا کہ ہاں میں جانتا ہوں یہ شخص اچھا ہے۔ تو امیرالمؤمنین نے پوچھا کہ تم کو کیسے معلوم کہ یہ اچھا شخص ہے کیا تم اس کے پڑوسی ہو؟ یا تم نے کبھی اس کے ساتھ سفر کیا ہے؟ اُس شخص نے کہا کہ جی نہیں! نہ میں اس کا پڑوسی ہوں نہ میں نے اس کے ساتھ سفر کیا ہے۔ تو امیرالمؤمنین نے فرمایا کہ لگتا ہے تم نے اِس آدمی کو مسجد سے نکلتے ہوئے دیکھا ہے اور اسی لیے فیصلہ کردیا کہ یہ اچھا آدمی ہے؟ امیر المؤمنین حضرت عمر رضی اللہ عنہ کے فرمان کا مطلب یہ تھا کہ کوئی شخص صرف مسجد سے نماز پڑھ کر نکلنے سے اچھا آدمی نہیں ہوجاتا ہے بلکہ ضروری ہے کہ وہ اپنے پڑوسی کے ساتھ اچھا سلوک کرے اور اس کے پڑوسی اس کے اچھا ہونے کی گواہی دیں۔ ورنہ نماز، روزہ، زکوٰۃ اور حج وغیرہ عبادات کا اہتمام کرنے کے باوجود ہم اچھے نہیں رہیں گے۔ ایک بار نبی کریم ﷺ نے ارشاد فرمایا کہ اللہ کے نزدیک بہترین پڑوسی وہ ہے جو اپنے پڑوسی کے ساتھ اچھا سلوک کرتا ہو۔ اِن تمام احادیث سے نبی کریم ﷺ اپنی امت کو یہی سکھارہے ہیں کہ ہر مؤمن اپنے پڑوسی کے ساتھ اچھا سلوک کرے اور اُس کو کسی قسم کی تکلیف نہ پہنچنے دے۔

واضح رہے کہ ایک پڑوسی تو وہ ہے جو مستقل پڑوسی ہے یعنی جو آپ کے گھر کا پڑوسی ہے اور ایک پڑوسی وہ بھی ہے جو کچھ دیر کے لیے آپ کا پڑوسی بنا ہے، جیسے آپ بس، ٹرین یا ہوائی جہاز میں سفر کررہے ہوں اور آپ کے بغل میں کوئی بیٹھا ہو یا آپ مسجد، یا کسی دینی و دنیاوی مجلس یا جلسوں میں ہوں اور آپ کے بغل میں کوئی بیٹھا ہو وہ بھی تھوڑی دیر ہی کے لیے سہی لیکن آپ کا پڑوسی ہے اس کے ساتھ بھی اچھا سلوک کرنے کا قرآن کریم نے حکم دیا ہے، لہٰذا ایسے پڑوسی کو بھی آرام پہنچانے کا خیال رکھنا چاہیے اور ہر ایسے کام سے بچنا چاہیے جس سے اُس بغل والے پڑوسی کو تکلیف پہنچے، جیسےبیڑی یا سیگریٹ کے دھوئیں سے اسی طرح آپ کے گٹکھا وغیرہ کھانے سے اُس کو تکلیف ہورہی ہو تو ہر گز ایسی چیزوں کا استعمال نہ کریں۔

آخر میں درخواست کی کہ جو باتیں عرض کی گئی ہیں اُن پر ہم لوگ ضرور عمل کریں، اگر ہم سب لوگ اپنے اپنے پڑوسی کا خیال کرنے لگیں تو نہ ہم سے کسی کو تکلیف پہنچے اور نہ ہم کو کسی سے تکلیف پہنچے، اِس طرح ہمارا معاشرہ ایک بہترین اور خوشگوار معاشرہ بن سکتا ہے۔

پھر دعا پر پروگرام کا اختتام ہوا۔

اِس پروگرام میں کافی لوگ موجود تھے، قصبہ کے معزز لوگوں کے ساتھ ساتھ نوجوانوں کی ایک بڑی تعداد موجود تھی۔

Tuesday, August 29, 2023

مسجدوں کے منبر سے حج کی ترغیب کی ضرورت

مسجدوں کے منبر سے حج کی ترغیب کی ضرورت

🖊️ زین العابدین قاسمی
خادم جامعہ قاسمیہ اشرف العلوم نواب گنج علی آباد ضلع بہرائچ

حدیث شریف میں دینِ اسلام کی بنیاد جن پانچ چیزوں پر بتائی گئی ہے اُن میں سے چار چیزیں؛ نماز، روزہ، زکوٰۃ اور حج عبادات ہیں، اور یہ چاروں اسلام کی بڑی اہم عبادات ہیں۔

اِن میں سے نماز، روزہ اور زکوٰۃ کے سلسلے میں مسجد کے منبر وغیرہ سے ترغیبی بیانات زیادہ ہوتے رہتے ہیں، لوگوں کو خوب ابھارا جاتا ہے، شوق دلایا جاتا ہے، اور وعیدوں (سزاؤں) سے ڈرایا جاتا ہے۔ جس کا فائدہ بھی خوب ہوتا ہے، لوگ اِن عبادات کا اہتمام بھی کرتے ہیں۔

مگر حج کے سلسلے میں ترغیبی بیانات پر علماء، خطباء، واعظین اور قلم کار حضرات توجہ کم‌ دیتے ہیں، اور توجہ بھی دیتے ہیں تو اُس وقت جب حج کا‌مہینہ آتا ہے، یا لوگ حج پر جانے لگتے ہیں، حالاں کہ موجودہ زمانے میں اُس وقت ترغیبی بیانات بے موقع اور بے وقت ثابت ہوتے ہیں؛ کیوں کہ اُس وقت اگر کوئی شخص ترغیبی ‌بیان سن کر متأثر ہوتا ہے اور سفرِ حج کا ارادہ بھی بناتا ہے تو چوں کہ سفرِ حج کے لیے کئی مہینوں پہلے ہی سے کارروائی شروع ہوجاتی ہے اس لیے اب اس کو اگلے سال ہی سفر کا‌موقع مل پائے گا، اتنے لمبے عرصے میں اُس کا شوق اور جذبہ ٹھنڈا پڑ سکتا‌ہے۔

ہاں جس زمانے میں حج کی کارروائی کے لیے کئی کئی مہینوں کی ضرورت نہیں ہوتی تھی؛ بلکہ آناً فاناً بھی شوال یا ذوقعدہ کے مہینے میں کوئی حج کا ارادہ بناتا تو وہ بھی بآسانی جاسکتا تھا، تو اُس زمانے میں ترغیبی بیانات کے لیے شوال اور ذوقعدہ کے مہینے ہی موزوں ہوتے تھے۔

چنانچہ حکیم الامت حضرت مولانا اشرف علی تھانوی رحمہ اللہ کے خطبات کا‌مطالعہ کرنے سے معلوم ہوتا ہے کہ آپ کا معمول یہ تھا کہ ہر سال شوال کے مہینے میں حج کے موضوع پر زیادہ بیان فرماتے تھے اور اس کی وجہ لوگوں کو حج کی ترغیب دینی ہوتی تھی، اُس وقت جس کے دل میں حج کا شوق پیدا ہوتا آسانی کے ساتھ حج کرنے چلا جاتا تھا۔

موجودہ وقت میں چوں کہ حج کی کارروائی کئی مہینوں تک چلتی ہے، اس لیے جب حج کی کارروائی شروع ہونے کا وقت آئے اُس سے پہلے ہی ترغیبی بیانات کا سلسلہ شروع کردینا چاہیے۔جیسے 2024/۱۴۴۵ کے سفرِ حج کے لیے ماہِ اکتوبر سے فارم‌بھرے جائیں گے، اور فارم بھروانے کے لیے پاسپورٹ ہونا ضروری ہے، اور پاسپورٹ بنوانے کے لیے ایک سے دو مہینے کا‌وقت لگ جاتا ہے، اِس اعتبار سے دیکھا جائے تو حج کے تعلق سے ترغیبی بیانات کے لیے یہ وقت یعنی ستمبر کا مہینہ زیادہ موزوں ہے۔ لہٰذا اِس وقت اگر حج کی اہمیت اور اس کے فضائل، حج فرض ہونے کے باوجود ادائیگی نہ کرنے پر وعید، حج کے دینی و دنیاوی فائدے، حرمین شریفین کے فضائل، مقاماتِ مقدسہ کے فضائل وغیرہ کے موضوعات پر بیان کرکے لوگوں کو ابھارا جائے، انہیں شوق دلایا جائے، اور اِس سے متاثر ہوکر اگر کوئی شخص حج کرنا‌چاہے تو 2024 کے حج کی تیاری آرام سے کرسکتا ہے۔‌

بہت سے مالدار لوگ ایسے ہیں جن پر حج فرض ہے، حج کرنے میں کوئی چیز رکاوٹ بھی نہیں ہے، لیکن غفلت و لاپرواہی اور دنیا کے کاموں میں مصروف ہونے کی وجہ سے اُن کا دھیان حج کرنے کی طرف نہیں جاتا ہے، مگر یہ لوگ جب حج کا بیان سنتے ہیں تو انہیں احساس ہوتا ہے، اور حج کی تیاری شروع کردیتے ہیں، ایسی بہت سی مثالیں بھی موجود ہیں۔

لہٰذا آنے والے دو تین جمعہ میں اگر مسجد کے منبر سے حج کے عنوان پر بیان کا اہتمام کیا جائے تو اللہ کے بہت سے بندوں کے دل میں حج کا شوق پیدا ہوسکتا ہے۔

Saturday, July 15, 2023

अहले इल्म की ज़िम्मेदारी है कि अवाम को सही शरई मसला बताएं

अहले इल्म की ज़िम्मेदारी है कि अवाम को सही शरई मसला बताएं!

🖊️ ज़ैनुल आबिदीन क़ासमी
ख़ादिम जामिया क़ासमिया अशरफ़ुल उलूम नवाबगंज अलियाबाद ज़िला बहराइच

कल बाद नमाज़े अस्र एक साहब का फ़ोन आया, मुलाक़ात की दरख़ास्त की, वो उस वक़्त अपनी दुकान पर थे, मैं मदरसा में किसी काम में मसरूफ़ था, इसलिए दुकान पर जाने से माज़िरत करली, तो उन्हों ने मग़रिब बाद अपने दौलत ख़ाने पर बुलाया, मैं वहां पहुँचा, बात शुरू हुई।

दर असल चार पाँच दिन पहले उन की शादी शुदा बहन का इंतिक़ाल हुआ था (अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त उनकी मग़फ़िरत फ़रमाए) उन की पर्स में कुछ रक़म मिली थी, वो पूरी रक़म उन के ईसाले सवाब के लिए हमारे मदरसे में तामीरी काम में ख़र्च करने के लिए देना चाह रहे थे, और इसी‌ मक़्सद से मुझे बुलाया था।

वो ये समझ रहे थे कि ये रक़म मेरी बहन ही का है, तो लाओ उन के ईसाले सवाब के लिए मदरसे में लगा दूँ, उन को सवाब पहुंचता रहेगा। और उन्हों ने ये भी बताया कि बहनोई साहब से भी बात हो गई है वो भी इस पर राज़ी हैं।

मुझे ये बात मालूम थी कि मरहूमा के वालिद भी ज़िन्दा हैं, और मरहूमा के तीन छोटे छोटे बच्चे भी हैं।

तो मैंने उन‌ को बताया कि आप यह रक़म ऐसे नहीं दे सकते हैं, इस में कई लोगों का हिस्सा है, उन के दर्मियान यह रक़म तक़्सीम होगी, फिर उन में से बालिग़ लोग अपना हिस्सा चाहें तो‌ मरहूमा के ईसाले सवाब के लिए दे सकते हैं, मगर नाबालिग़ का हिस्सा नहीं दे सकते हैं।

चूँकि मैं मुफ़्ती नहीं हूँ इसलिए अगर कोई अहम मसला होता है तो मालूम होने के बावुजूद भी मैं किसी मुफ़्ती साहब से पहले समझ लेता हूँ, चुनांचे मैंने एक मुफ़्ती साहब से रुजू किया।

फिर मरहूमा के भाई को मैंने बताया कि चूँकि आपकी मरहूमा बहन के पीछे उन के वालिद, शौहर और तीन बेटे हैं, इसलिए वो पूरी रक़म चौबीस हिस्सों में तक़्सीम होगी, फिर छठा हिस्सा यानी चार हिस्से वालिद को, चौथा हिस्सा यानी छः हिस्से शौहर को और बक़िया रक़म बराबर बराबर तीनों बेटों को मिलेंगे।

अब वालिद और शौहर चाहें तो अपना अपना हिस्सा दे सकते हैं बाक़ी तीनों बच्चों का हिस्सा नहीं दे सकते, इसलिए कि वो नाबालिग़ हैं और नाबालिग़ के माल में किसी को भी तसर्रुफ़ का हक़ नहीं होता है।

वो रक़म चूँकि 5240 रुपये थी, इसलिए वालिद को छठा हिस्सा यानी 873 रुपये, शौहर को चौथा हिस्सा यानी 1310 रुपये और बक़िया 3055 रुपये में से तीनों बच्चों को बराबर बराबर मिले।

इस के बाद वालिद और शौहर दोनों ने अपने अपने हिस्से यानी 2183 रुपये मदरसे में ईसाले सवाब के लिए दे दिए।

अगर मैं उन्हें शरई मसला न बताता तो वो पूरी रक़म मदरसे में दे रहे थे।

फिर मैंने उन्हें ये भी बताया कि सिर्फ यही रक़म तक़्सीम नहीं होगी; बल्कि मरहूमा ने जो भी छोड़ा होगा, रुपये और जे़वरात सब इसी तरह तक़्सीम होंगे।

आख़िर में उन्होंने क़ुरआन ख़्वानी का तज़्किरा किया तो मैंने कहा कि ये ग़लत है, क़ुरआन ख़्वानी बिल्कुल न कराएं, ये जो मदरसे के बच्चों को घर पर बुलवा कर क़ुरआन ख़्वानी करवाते हैं, उस के बाद नाश्ता या खाने का जो इंतिज़ाम करते हैं ये बिल्कुल ग़लत है, ऐसा करने से मरहूमा को तो सवाब पहुंचता ही नहीं उल्टा क़ुरआन ख़्वानी करवाने वाले लोग गुनाहगार भी होते हैं।

इसी लिए मैं अपने मदरसे के बच्चों को क़ुरआन ख़्वानी के लिए नहीं भेजता हूँ चाहे कोई ख़ुश रहे या नाख़ुश हो जाए। हाँ मदरसे‌ में ही बग़ैर नाशता और खाने के ईसाले सवाब करवा देता‌ हूँ।

जो काम बिद्अती करते हैं वही काम हम करें तो फ़र्क़ क्या रहा?

اہلِ علم کی ذمہ داری ہے کہ عوام کو صحیح شرعی مسئلہ بتائیں

اہلِ علم کی ذمہ داری ہے کہ عوام کو صحیح شرعی مسئلہ بتائیں!

🖊️ زین العابدین قاسمی
خادم جامعہ قاسمیہ اشرف العلوم نواب گنج علی آباد ضلع بہرائچ

کل بعد نمازِ عصر ایک صاحب کا فون آیا ملاقات کی درخواست کی، وہ اُس وقت اپنی دوکان پر تھے، میں مدرسہ میں کسی کام میں مصروف تھا، اس لیے دوکان پر جانے سے معذرت کرلی، تو انھوں نے مغرب بعد اپنے دولت خانے پر بلایا، میں وہاں پہونچا، بات شروع ہوئی۔

در اصل چار پانچ دن قبل اُن کی شادی شدہ بہن کا انتقال ہوا تھا (اللہ ربّ العزت ان کی مغفرت فرمائے) اُن کی پَرس میں کچھ رقم ملی تھی، وہ پوری رقم اُن کے ایصالِ ثواب کے لیے ہمارے مدرسے میں تعمیری کام میں صَرف کرنے کے لیے دینا چاہ رہے تھے، اور اسی‌مقصد سے مجھے بلایا تھا۔

وہ یہ سمجھ رہے تھے کہ یہ رقم میری بہن ہی کا ہے، تو لاؤ اُن کے ایصالِ ثواب کے لیے مدرسے میں لگادوں، اُن کو ثواب پہنچتا رہے گا۔ اور انھوں نے یہ بھی بتایا کہ بہنوئی صاحب سے بھی بات ہوگئی ہے وہ بھی اِس پر راضی ہیں۔

مجھے یہ بات معلوم تھی کہ مرحومہ کے والد بھی باحیات ہیں، اور مرحومہ کے تین چھوٹے چھوٹے بچے بھی ہیں۔

تو میں نے ان‌کو بتایا کہ آپ یہ رقم ایسے نہیں دے سکتے ہیں، اِس میں کئی لوگوں کا حصہ ہے، اُن کے درمیان یہ رقم تقسیم ہوگی، پھر اُن میں سے بالغ لوگ اپنا حصہ چاہیں تو ‌مرحومہ کے ایصالِ ثواب کے لیے دے سکتے ہیں، مگر نابالغ کا حصہ نہیں دے سکتے ہیں۔

چوں کہ میں مفتی نہیں ہوں اس لیے اگر کوئی اہم مسئلہ ہوتا ہے تو معلوم ہونے کے باوجود بھی میں کسی مفتی صاحب سے پہلے سمجھ لیتا ہوں، چنانچہ میں نے ایک مفتی صاحب سے رجوع کیا۔

پھر مرحومہ کے بھائی کو میں نے بتایا کہ چوں کہ آپ کی مرحومہ بہن کے پیچھے اُن کے والد، شوہر اور تین بیٹے ہیں، اس لیے وہ پوری رقم چوبیس حصوں میں تقسیم ہوگی، پھر چھٹا حصہ یعنی چار حصے والد کو، چوتھا حصہ یعنی چھ حصے شوہر کو اور بقیہ رقم برابر برابر تینوں بیٹوں کو ملیں گے۔

اب والد اور شوہر چاہیں تو اپنا اپنا حصہ دے سکتے ہیں باقی تینوں بچوں کا حصہ نہیں دے سکتے، اس لیے کہ وہ نابالغ ہیں اور نابالغ کے مال میں کسی کو بھی تَصَرُّف کا حق نہیں ہوتا ہے۔

وہ رقم چوں کہ 5240 روپئے تھی، اس لیے والد کو چھٹا حصہ یعنی 873 روپئے، شوہر کو چوتھا حصے یعنی 1310 روپئے اور بقیہ 3055 روپئے میں سے تینوں بچوں کو برابر برابر ملے۔

اس کے بعد والد اور شوہر دونوں نے اپنے اپنے حصے یعنی 2183 روپئے مدرسے میں ایصالِ ثواب کے لیے دے دئیے۔

اگر میں انھیں شرعی مسئلہ نہ بتاتا تو وہ پوری رقم مدرسے میں دے رہے تھے۔

پھر میں نے انھیں یہ بھی بتایا کہ صرف یہی رقم تقسیم نہیں ہوگی؛ بلکہ مرحومہ نے جو بھی چھوڑا ہوگا، روپئے اور زیورات سب اسی طرح تقسیم ہوں گے۔

آخر میں انھوں نے قرآن خوانی کا تذکرہ کیا تو میں نے کہا کہ یہ غلط ہے، قرآن خوانی بالکل نہ کرائیں، یہ جو مدرسے کے بچوں کو گھر پر بلوا کر قرآن خوانی کرواتے ہیں، اس کے بعد ناشتہ یا کھانے کا جو انتظام کرتے ہیں یہ بالکل غلط ہے، ایسا کرنے سے مرحومہ کو تو ثواب پہنچتا ہی نہیں الٹا قرآن خوانی کروانے والے  لوگ گناہ گار بھی ہوتے ہیں۔

اسی لیے میں اپنے مدرسے کے بچوں کو قرآن خوانی کے لیے نہیں بھیجتا ہوں چاہے کوئی خوش رہے یا ناخوش ہوجائے۔ ہاں مدرسے‌میں ہی بغیر ناشتہ اور کھانے کے ایصالِ ثواب کروادیتا‌ہوں۔

جو کام بدعتی کرتے ہیں وہی کام ہم کریں تو فرق کیا رہا؟

Thursday, June 22, 2023

احکامِ ذی الحجہ (تیسری قسط)

احکامِ ذی الحجہ

 (تیسری قسط)

🖊️ *زین العابدین قاسمی*
خادم جامعہ قاسمیہ اشرف العلوم نواب گنج علی آباد ضلع بہرائچ

عیدین کا آغاز:

حضرت انسؓ فرماتے ہیں:
قَدِمَ النَّبِیُّﷺ الْمَدِیْنَۃَ وَلَھُمْ یَوْمَانِ یَلْعَبُوْنَ فِیْھِمَا فَقَالَ: مَاھٰذَانِ الْیَوْمَانِ؟ قَالُوْا: نَلْعَبُ فِیْھِمَا فِی الْجَاھِلِیَّۃِ فَقَالَ رَسُوْلُ اللہِﷺ: قَدْ اَبْدَلَکُمُ اللہُ بِھِمَا خَیْرًا مِنْھُمَا یَوْمَ الْاَضْحیٰ وَیَوْمَ الْفِطْرِ۔ (رواہ ابوداؤد)

ترجمہ: رسول اللہﷺ (مکہ سے ہجرت فرماکر) مدینہ تشریف لائے تو مدینہ والے (جن کی کافی تعداد پہلے ہی سے اسلام قبول کرچکی تھی) دو تہوار منایا کرتے تھے، اور ان میں کھیل تماشے کیا کرتے تھے، رسول اللہﷺ نے ان سے پوچھا: یہ دو دن جو تم مناتے ہو ان کی کیا حقیقت اور حیثیت ہے؟ (یعنی تمہارے ان تہواروں کی کیا اصلیت اور تاریخ ہے) انھوں نے عرض کیا: ہم زمانۂ جاہلیت میں (یعنی اسلام سے پہلے) یہ تہوار اسی طرح منایا کرتے تھے، (بس وہی رواج ہے جو اب تک چل رہا ہے) رسول اللہﷺ نے فرمایا: اللہ تعالیٰ نے تمھارے ان دو تہواروں کے بدلے میں ان سے بہتر دو دن تمھارے لیے مقرر کردئے ہیں (اب وہی تمھارے قومی اور مذہبی تہوار ہیں )یوم عید الاضحیٰ اور یوم عید الفطر۔

”قوموں کے تہوار در اصل اُن کے عقائد و تصوُّرات اور ان کی تاریخ وروایات کے ترجمان اور ان کے قومی مزاج کے آئینہ دار ہوتے ہیں؛ اس لیے ظاہر ہے کہ اسلام سے پہلے اپنی جاہلیت کے دور میں اہلِ مدینہ جو دو تہوار مناتے تھے وہ جاہلی مزاج تصورات اور جاہلی روایات ہی کے آئینہ دار ہوں گے، رسول اللہﷺ نے؛ بلکہ حدیث کے صریح الفاظ کے مطابق خود اللہ تعالیٰ نے ان قدیمی (پرانے) تہواروں کو ختم کراکے ان کی جگہ عید الفطر اور عیدالاضحیٰ دو تہوار اس امت کے لیے مقرر فرمادئےجو اس کے توحیدی مزاج اور اُصولِ حیات کے عین مطابق اور اس کی تاریخ و روایات اور عقائد و تصورات کے پوری طرح آئینہ دار ہیں۔

 کاش! اگر مسلمان اپنے ان تہواروں ہی کو صحیح طور پر اور رسول اللہﷺ کی ہدایت و تعلیم کے مطابق منائیں تو اسلام کی روح اور اس کے پیغام کو سمجھنے سمجھانے کے لیے صرف یہ دو تہوار ہی کافی ہوسکتے ہیں۔“ (معارف الحدیث ۳/۲۳۹،۲۴۰)

اَیّامِ تشریق/تکبیر تشریق:

 ذوالحجہ کے تین دنوں (گیارہویں، بارہویں اور تیرہویںتاریخ ) کو ”اَیّامِ تشریق“ کہا جاتا ہے۔ یوم عرفہ، یوم النحر اور ایامِ تشریق اِن پانچ دنوں میں یعنی نویں ذوالحجہ کی فجر سے تیرہویں ذوالحجہ کی عصر تک ہر نماز کے بعد ایک مرتبہ تکبیر تشریق یعنی اَللّٰہُ اَکْبَرْ اَللّٰہُ اَکْبَرْ، لَا اِلٰہَ اِلَّا اللّٰہُ وَاللّٰہُ اَکْبَرْ، اَللّٰہُ اَکْبَرْ وَلِلّٰہِ الْحَمْدْبآواز بلند پڑھنا ہرنمازی خواہ جماعت سے پڑھنے والاہو یا تنہا، مسافر ہو یا مقیم، مرد ہو یا عورت سب پرواجب ہے؛البتہ عورت آہستہ کہے۔

(جاری)

Monday, June 19, 2023

अशरा-ए-ज़िल्हिज्जा किस तरह गुजारें?

अशरा-ए-ज़िल्हिज्जा किस तरह गुज़ारें?

जैनुल आबिदीन क़ासमी
ख़ादिम जामिया क़ासमिया अशरफ़ुल उलूम नवाबगंज अलियाबाद जि० बहराइच यू०पी० 
9670660363


आज दिनांक 30 जून 2022 ई० को इस्लामी/हिज्री कैलेंडर के आख़िरी और बारहवें महीना ज़ुल्हिज्जा का चांद निकल आया है, इस महीने की 1 तारीख़ से 10 तारीख़ तक को अशरा-ए-ज़िल्हज्जा कहते हैं, अशरा-ए-ज़िल्हिज्जा की बाबरकत और फ़ज़ीलत वाली साअतें शुरू हो चुकी हैं, जैसा कि क़ुरआन व हदीस की रोशनी में इन दस दिनों की फ़ज़ीलतैं आई हैं, सबसे बड़ी फ़ज़ीलत तो यही है कि इन दस दिनों के अंदर किया जाने वाला हर नेक अमल अल्लाह तआला को बहुत महबूब और पसंदीदा है; लिहाज़ा अब हम सबको चाहिए कि नेक अमल की कसरत शुरू कर दें।

⚫ सबसे पहले तो ये तै करलें कि पांचों नमाज़ैं बा जमाअत अदा करने का एहतिमाम करेंगे, इस के लिए मस्जिद जल्दी पहुंचने की कोशिश करें ताकि तक्बीरे ऊला ही से इमाम के साथ शरीक रहें।

⚫ सुन्नते मुअक्कदा व सुन्नते ग़ैर मुअक्कदा और नवाफ़िल का भी एहतिमाम करें, जिन नमाज़ों के बाद दो रकातैं नफ़्ल पढ़ते थे तो अब नफ़्ल की रकातों को दो से बढ़ा लें, कम से कम चार या छः या आठ या जिस क़दर हो सके पढ़ें।

⚫ तहज्जुद की नमाज़ पढ़ने का एहतिमाम ज़रूर करें, नीज़ इशराक़, चाश्त, औव्वाबीन की नमाज़ों का भी एहतिमाम करें।

⚫ वुज़ू घर या दूकान पर बनाएं और वहीं दो रकात तहिय्यतुल वुज़ू पढ़ें, फिर मस्जिद पहुंच कर दो रकात तहिय्यतुल मस्जिद पढ़ें।

⚫ मस्जिद पहुंचने के बाद तहिय्यतुल मस्जिद और सुन्नत पढ़ कर फ़ारिग़ हो‌ जाएं और जमाअत खड़ी होने में अभी वक़्त बाक़ी हो तो तस्बीह (सुब्हानल्लाहि व बिहम्दिही  सुब्हानल्लाहिल ज़ीम), इस्तिग़फ़ार (अस्तग़्फ़िरुल़्लाहल्लज़ी ला इला ह इल्ला हुवल हय्युल क़ैय्यूम  व अतूबु इलैह) और दुरूद शरीफ़ पढ़ते रहें।

⚫ हर नमाज़ से पहले और बाद में थोड़ी देर क़ुरआने करीम पढ़ने का मामूल बना लें।

⚫ क़ुरआने करीम इस कसरत से पढ़ें कि दस दिनों के अंदर कम से कम एक बार पूरा क़ुरआन ख़त्म कर दें, या फिर जितना भी हो सके पढ़ें।

⚫ हर वक़्त बावुज़ू रहने की कोशिश करें, जब भी वुज़ू टूटे तो फौरन वुज़ू बना लें, नमाज़ का वक़्त आने का इंतिज़ार न करें।

⚫ हर ख़ाली वक़्त में ज़ुबान पर तस्बीह, इस्तिग़फ़ार, दुरूद शरीफ़ जारी रहे।

⚫ हस्बे हैसियत सदक़ा ख़ैरात करते रहें।

⚫ ग़रीबों, मुहताजों, ज़रूरतमंदों की ख़बरगीरी करते रहें। (इस इंतिज़ार में न रहें कि कोई मांगने वाला आए तब दूं; बल्कि ख़ुद पता लगाने की कोशिश करें कि कौन ज़रूरतमंद है? किस को किस चीज़ की ज़रूरत है?

⚫ अपनी मस्जिदों के इमाम व मुअज़्ज़िन, मदरसों/मक्तबों में पढ़ाने वाले उलमा व  हुफ़्फ़ाज़ को हदया व तोहफ़ा भी देने की कोशिश करें।

⚫ गुनाहों से दूर रहने की पूरी कोशिश करें।

⚫ हमारे जिस्म के जिन आज़ा से गुनाह ज़्यादा सादिर होते हैं उनके इस्तिमाल में काफ़ी एहतियात बरतें। जैसे आँख, कान, ज़ुबान वग़ैरा।

⚫ पहली तारीख़ से लेकर नवीं तारीख़ तक जितने दिन भी हो सके रोज़ा रखें, ख़ुसूसन नवीं तारीख़ यानी अरफ़ा के दिन ज़रूर रोज़ा रखें।

⚫ ज़ुल्हिज्जा की पहली रात से लेकर दसवीं रात तक हर रात में जितनी देर भी हो सके इबादत करें।

⚫ अगर रात के आख़िरी हिस्से में जागना आसान हो तो इशा पढ़ कर फौरन सो जाएं और रात के आख़िरी हिस्सा में उठ कर इबादत में मसरूफ़ होजाएं; क्यूंकि रात का आख़िरी हिस्सा बहुत क़ीमती होता है, उस वक़्त इबादत करने वालों से अल्लाह बहुत ख़ुश होते हैं। और अगर आख़िरी हिस्सा में जागना दुशवार हो तो इशा के बाद ही जितनी देर भी हो सके इबादत में मशग़ूल रहें फिर सो जाएं।

⚫ माँ बाप की ख़िदमत करते रहें, उनको हर तरह से आराम पहुंचाने की कोशिश करें, उनकी किसी बात का जवाब इस तरह हरगिज़ ना दें कि उनको मामूली तकलीफ़ भी पहुंचे।

⚫ पड़ोसी के साथ अच्छा सुलूक करें, हमारे घर में कोई अच्छी चीज़ बने तो थोड़ा सा पड़ोसी के घर भी भेजवा दें।

⚫ हर एक के साथ अच्छे अख़्लाक़ से पेश आएं।

⚫ हमारे साथ कोई बुरा सुलूक करे तब भी हम उस के साथ अच्छा बरताव ही करें।

⚫ सच्चाई और दयानतदारी के साथ तिजारत और कारोबार करें।

अल्लाह तआला हम सबको अमल की तौफ़ीक़ अता फरमाए। आमीन

عشرۂ ذی الحجہ کیسے گذاریں؟

عشرۂ ذی الحجہ کس طرح گذاریں؟

زین العابدین قاسمی
خادم جامعہ قاسمیہ اشرف العلوم نواب گنج علی آباد ضلع بہرائچ
9670660363

آج مؤرخہ ۱۹/ جون۲۰۲۳؁ء کو اسلامی/ہجری کیلنڈر کے آخری اور بارہویں مہینہ ذوالحجہ کا چاند نکل آیا ہے، عشرۂ ذی الحجہ کی بابرکت اور فضیلت والی ساعتیں شروع ہوچکی ہیں، جیسا کہ قرآن وحدیث کی روشنی میں اِن دس دنوں کی فضیلتیں آئی ہیں، سب سے بڑی فضیلت تو یہی ہے کہ ان دس دنوں کے اندر کیا جانے والا ہر نیک عمل اللہ تعالیٰ کو بہت محبوب اور پسندیدہ ہے؛ لہذا اب ہم سب کو چاہیے کہ نیک عمل کی کثرت شروع کردیں۔

۞ سب سے پہلے تو یہ طے کرلیں کہ پانچوں نمازیں باجماعت ادا کرنے کا اہتمام کریں گے، اس کے لیے مسجد جلدی پہنچنے کی کوشش کریں تاکہ تکبیر اولیٰ ہی سے امام کے ساتھ شریک رہیں۔

۞سنت مؤکدہ و سنت غیر مؤکدہ اور نوافل کا بھی اہتمام کریں، جن نمازوں کے بعد دو رکعتیں نفل پڑھتے تھے تو اب نفل کی رکعتوں کو دو سے بڑھالیں، کم سے کم چار یا چھ یا آٹھ یا جس قدر ہوسکے پڑھیں۔

۞ تہجد کی نماز پڑھنے کا اہتمام ضرور کریں، نیز اشراق، چاشت، اوّابین کی نمازوں کا بھی اہتمام کریں۔

۞ وضو گھر یا دوکان پر بنائیں اور وہیں دو رکعت تحیۃ الوضو پڑھیں، پھر مسجد پہنچ کر دو رکعت تحیۃ المسجد پڑھیں۔

۞مسجد پہنچنے کے بعدتحیۃ المسجد اور سنت پڑھ کر فارغ ہوجائیں اور جماعت کھڑی ہونے میں ابھی وقت باقی ہو تو تسبیح (سُبْحَانَ اللہِ وَبِحَمْدِہٖ سُبْحَانَ اللہِ الْعَظِیْم )، استغفار (اَسْتَغْفِرُ اللہَ الَّذِیْ لَآ اِلٰہَ اِلَّا ھُوَ الْحَیُّ الْقَیُّوْمُ وَاتُوْبُ اِلَیْہِ)اور درود شریف پڑھتے رہیں۔

۞ ہر نماز سے پہلے اور بعد میں تھوڑی دیر قرآن کریم پڑھنے کا معمول بنالیں۔

۞ قرآن کریم اس کثرت سے پڑھیں کہ دس دنوں کے اندر کم از کم ایک بار پورا قرآن ختم کردیں، یا پھر جتنا بھی ہوسکے پڑھیں۔

۞ہر وقت باوضو رہنے کی کوشش کریں، جب بھی وضو ٹوٹے تو فورا وضو بنالیں، نماز کا وقت آنے کا انتظار نہ کریں۔

۞ہرخالی وقت میں زبان پر تسبیح، استغفار، درود شریف جاری رہے۔
۞ حسبِ حیثیت صدقہ خیرات کرتے رہیں۔

۞ غریبوں، محتاجوں، ضرورت مندوں کی خبر گیری کرتے رہیں۔ (اس انتظار میں نہ رہیں کہ کوئی مانگنے والاآئے تب دوں؛ بلکہ خود پتہ لگانے کی کوشش کریں کہ کون ضرورت مند ہے؟ کس کو کس چیز کی ضرورت ہے؟)

۞ اپنی مسجدوں کے امام و مؤذن، مدرسوں/مکتبوں میں پڑھانے والے علماء و حفاظ کو ہدیہ و تحفہ بھی دینےکی کوشش کریں۔

۞ گناہوں سے دور رہنے کی پوری کوشش کریں۔

۞ ہمارے جسم کے جن اعضاء سے گناہ زیادہ صادر ہوتے ہیں ان کے استعمال میں کافی احتیاط برتیں۔ جیسے: آنکھ، کان، زبان۔

۞ پہلی تاریخ سے لے کر نویں تاریخ تک جتنے دن بھی ہوسکے روزہ رکھیں، خصوصاً نویں تاریخ یعنی عرفہ کے دن ضرور روزہ رکھیں۔

۞ ذوالحجہ کی پہلی رات سے لے کر دسویں رات تک ہر رات میں جتنی دیر بھی ہوسکے عبادت کریں۔

۞ اگررات کے آخری حصہ میں جاگنا آسان ہو تو عشاء پڑھ کر فورا سوجائیں اور رات کے آخری حصہ میں اٹھ کر عبادت میں مصروف ہوجائیں؛ کیونکہ رات کا آخری حصہ بہت قیمتی ہوتا ہے، اُس وقت عبادت کرنے والوں سے اللہ بہت خوش ہوتے ہیں۔ اور اگر آخری حصہ میں جاگنا دشوار ہو تو عشاء کے بعد ہی جتنی دیر بھی ہوسکے عبادت میں مشغول رہیں پھر سوجائیں۔

۞ ماں باپ کی خدمت کرتے رہیں، ان کو ہر طرح سے آرام پہنچانے کی کوشش کریں، ان کی کسی بات کا جواب اس طرح ہرگز نہ دیں کہ ان کو معمولی تکلیف بھی پہنچے۔

۞ پڑوسی کے ساتھ اچھا سلوک کریں، ہمارے گھر میں کوئی اچھی چیز بنے تو تھوڑا سا پڑوسی کے گھر بھی بھیجوادیں۔

۞ ہر ایک کے ساتھ اچھے اخلاق سے پیش آئیں۔

۞ ہمارے ساتھ کوئی برا سلوک کرے تب بھی ہم اس کے ساتھ اچھا برتاؤ ہی کریں۔

۞ سچائی اور دیانتداری کے ساتھ تجارت اور کاروبار کریں۔
اللہ تعالیٰ ہم سب کو عمل کی توفیق عطا فرمائے۔ آمین

Saturday, June 17, 2023

अहकामे ज़िल्हिज्जा (दूसरी क़िस्त)

अहकामे ज़िल्हिज्जा
(दूसरी क़िस्त)

🖊️ ज़ैनुल आबिदीन क़ासमी
ख़ादिम जामिया क़ासमिया अशरफ़ुल उलूम नवाबगंज अलियाबाद ज़िला बहराइच यू०पी०
9670660363

यौमे अरफ़ा और उस की फ़ज़ीलत:

ज़ुल्हिज्जा की नवीं तारीख़ को “यौमे अरफ़ा” कहा जाता है, इस दिन रोज़ा रखना मुस्तहब है और उस की फ़ज़ीलत ये है कि इस से दो साल के गुनाह मुआफ़ हो जाते हैं।

नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया:

“अरफ़ा के दिन का रोज़ा; बेशक मैं अल्लाह तआला से सवाब की उम्मीद बाँधता हूँ कि वह मिटा देंगे उस साल (के गुनाहों) को जो बाद में आने वाला है और उस साल (के गुनाहों) को जो गुज़र चुका है।(यानी एक साल अगले और एक साल पिछले के गुनाहों को मिटा देंगे।” (मुस्लिम , तिर्मिज़ी)

यौमुन्नह्र/यौमुल अज़्हा :

ज़ुल्हिज्जा की दसवीं तारीख़ को “यौमुन्नह्र, यौमुल अज़्हा” यानी क़ुर्बानी का दिन और “ईदुल अज़्हा, ईदे कुर्बाँ और बक़रईद” कहा जाता है। इसी दिन दूसरी ईद यानी ईदुल्अज़्हा मनाई जाती है, और यह दिन मुस्लमानों का दूसरा मज़्हबी (धार्मिक) त्योहार है।

इस्लामी त्योहार; ईदुल फ़ित्र और ईदुल अज़्हा:

रसूलुल्ला सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का इरशाद है:

“हर क़ौम की (कोई न कोई) ईद होती है और हमारी ईद यह है।” (बुख़ारी)

हज़रत मौलाना मुहम्मद मन्ज़ूर नोमानी रहि० तहरीर फ़रमाते हैं:
“हर क़ौम के कुछ ख़ास त्योहार और जश्न के दिन होते हैं, जिनमें उस क़ौम के लोग अपनी अपनी हैसियत और सतह के मुताबिक़ अच्छा लिबास पहनते और उम्दा खाने पकाते और खाते हैं, और दूसरे तरीक़ों से भी मुसर्रत ख़ुशी का इज़्हार करते हैं, यह गोया इन्सानी फ़ित्रत का तक़ाज़ा है; इसी लिए इन्सानों का कोई तब्क़ा और फ़िर्क़ा ऐसा नहीं है जिसके यहाँ त्योहार और जश्न के कुछ ख़ास दिन ना हों।
इस्लाम में भी ऐसे दो दिन रखे गए हैं; एक ईदुल फ़ित्र और दूसरे ईदुल अज़्हा, बस यही मुस्लमानों के असली मज़्हबी व मिल्ली त्योहार हैं। इनके इ
अलावा मुस्लमान जो त्योहार मनाते हैं उनकी कोई मज़्हबी हैसियत और बुनियाद नहीं है; बल्कि इस्लामी नुक़्ता-ए-नज़र से उनमें से अक्सर ख़ुराफ़ात हैं।
मुस्लमानों की इज्तिमाई ज़िंदगी उस वक़्त से शुरू होती है जब कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम हिजरत फ़रमा कर मदीना तैय्यबा आए। ईदुल फ़ित्र और ईदुल अज़्हा, इन दोनों त्योहारों का सिलसिला भी उसी वक़्त से शुरू हुआ है। जैसा कि मालूम है ईदुल फ़ित्र रमज़ानुल मुबारक के ख़त्म होने पर पहली शव्वाल को मनाई जाती है और ईदुल अज़्हा 10 ज़ुल्हिज्जा को। रमज़ानुल मुबारक दीनी व रूहानी हैसियत से साल के बारह महीनों में सबसे मुबारक महीना है, इसी महीने में क़ुरआने मजीद नाज़िल होना शुरू हुआ, इसी पूरे महीने के रोज़े उम्मते मुस्लिमा पर फ़र्ज़ किए गए, इस की रातों में एक मुस्तक़िल बाजमाअत नमाज़ (तरावीह) का इज़ाफ़ा किया गया है, और हर तरह की नेकियों में इज़ाफ़ा की तर्ग़ीब दी गई । उल-ग़र्ज़ यह पूरा महीना ख़्वाहिशात की क़ुर्बानी और मुजाहिदा का और हर तरह की ताआत व इबादात की कसरत का महीना क़रार दिया गया, ज़ाहिर है कि इस महीने के ख़ातमे पर जो दिन आए ईमानी व रूहानी बरकतों के लिहाज़ से वही सबसे ज़्यादा इस का मुस्तहिक़ है कि इस को इस उम्मत के जश्न व मुसर्रत का दिन और त्योहार बनाया जाये, चुनांचे उसी दिन को ईदुल फ़ित्र क़रार दिया गया।
और 10 ज़ुल्हिज्जा वो मुबारक तारीख़ी दिन है जिसमें उम्मते मुस्लिमा के मुअस्सिस व मूरिसे आला सय्यिदुना हज़रत इब्राहीम ख़लीलुल्ला अलैहिस्सलाम ने अपनी दानिस्त में अल्लाह तआला का हुक्म व इशारा पा कर अपने लख़्ते जिगर सय्यिदुना इस्माईल अलैहिस्सलाम को उनकी रजामंदी से क़ुर्बानी के लिए अल्लाह के हुज़ूर में पेश करके और उनके गले पर छुरी रखकर अपनी सच्ची वफ़ादारी और कामिल तस्लीम व -रज़ा का सुबूत दिया था और अल्लाह तआला ने इश्क़ व मुहब्बत और क़ुर्बानी के इस इम्तिहान में उनको कामयाब क़रार देकर हज़रत इस्माईल अलैहिस्सलाम को ज़िंदा व सलामत रखकर उनकी जगह एक जानवर की क़ुर्बानी क़बूल फ़रमा ली थी, और हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम के सर पर (मैं तुमको लोगों का पेशवा बनाऊँगा) का ताज रख दिया था, और उनकी इस अदा की नक़ल को क़ियामत तक के लिए “रस्मे आशिक़ी” क़रार दे दिया था, पस अगर कोई दिन किसी अज़ीम तारीख़ी वाक़िआ की यादगार की हैसियत से त्योहार क़रार दिया जा सकता है तो इस उम्मते मुस्लिमा के लिए जो मिल्लते इब्राहीमी की वारिस और उस्वा-ए-खलीली की नुमाइंदा है 10 ज़ुल्हिज्जा के दिन के मुक़ाबले में कोई दूसरा दिन उस का मुस्तहिक़ नहीं हो सकता; इसलिए दूसरी ईद 10 ज़ुल्हिज्जा को क़रार दिया गया। जिस वादी ग़ैर ज़ी ज़रा (बे-आबो ग्याह) मैं हज़रत इस्माईल अलैहिस्सलाम की क़ुर्बानी का ये वाक़िआ पेश आया था उसी वादी में पूरे आलमे इस्लामी का हज का सालाना इज्तिमा और उस के मनासिके क़ुर्बानी वग़ैरा इस वाक़िआ की गोया असल और अव़्वल दर्जे की यादगार है, और हर इस्लामी शहर और बस्ती में ईद उल अज़्हा की तक़रीबात नमाज़ और क़ुर्बानी वगैरह भी इसी की गोया नक़्ल और दोम दर्जा की यादगार है। बहरहाल इन दोनों (पहली शव्वाल और १० ज़िल्हिज्जा) की इन ख़सूसिय्यात की वजह से इन को यौमुल ईद और उम्मते मुस्लिमा का त्योहार क़रार दिया गया।(मआरिफ़ुल हदीस हिस्सा सोम पेज न० 237,0293)

हज़रतुल उस्ताज़ मुफ़्ती सईद अहमद पालन पूरी साबिक़ शैख़ुल हदीस दारुल उलूम देवबंद फ़रमाते हैं:

“दुनिया में हर क़ौम के लिए ख़ुशी का कोई दिन होता है, अल्लाह अज़् ज़ व जल्ल ने इस उम्मत के लिए ख़ुशी के दो दिन मुक़र्रर किए हैं: ईदुल अज़्हा और ईदुल फ़ित्र, मगर मुस्लमानों का तरीक़ा दीगर अक़्वाम से मुख़्तलिफ़ है, इस्लाम ने ख़ुशी के दिनों में भी सबसे पहला काम इबादत मुक़र्रर किया है, दूसरी कौमें ख़ुशी के दिनों में शोर शराबा करती हैं, वो कोई इबादत नहीं करतीं, हम सबसे पहले दोगाना अदा करते हैं.......फिर चूँकि ये दोनों दिन सुरूर इंबिसात (ख़ुशी) के दिन हैं इसलिए दीगर ख़ुशी के काम भी जाएज़ हैं; बल्कि ऐसे काम जो गूना मुनासिब नहीं उन से भी सर्फ़े नज़र की जाती है।” (तोहफ़तुल क़ारी शरह बुख़ारी जिल्द 3 पेज 280)

(जारी)

احکامِ ذی الحجہ (دوسری قسط)

احکامِ ذی الحجہ
(دوسری قسط)

🖊️ زین العابدین قاسمی
خادم جامعہ قاسمیہ اشرف العلوم نواب گنج علی آباد ضلع بہرائچ یوپی

یومِ عَرَفَہ کی فضیلت:

 ذوالحجہ کی نویں تاریخ کو ”یَومِ عَرَفَہ“ کہا جاتا ہے، اس دن روزہ رکھنا مستحب ہےاور اس کی فضیلت یہ ہے کہ اس سے دوسال کے گناہ معاف ہوجاتے ہیں۔
نبیٔ کریم ﷺ نے فرمایا:
صِیَامُ یَوْمِ عَرَفَۃَ اَنِّیْ اَحْتَسِبُ عَلَی اللہِ اَنْ یُّکَفِّرَ السَّنَۃَ الَّتِیْ بَعْدَہٗ وَالسَّنَۃَ الَّتِیْ قَبْلَہٗ۔
ترجمہ: عرفہ کے دن کا روزہ؛ بیشک میں اللہ تعالیٰ سے ثواب کی امید باندھتا ہوں کہ وہ مٹادیں گے اُس سال (کے گناہوں) کو جو بعد میں آنے والاہے اور اُس سال (کے گناہوں) کو جو گذر چکا ہے۔(یعنی ایک سال اگلے اور ایک سال پچھلے کے گناہوں کو مٹادیں گے) (مسلم ، ترمذی)

یومُ النحّر/یومُ الاَضحٰی :

 ذوالحجہ کی دسویں تاریخ کو ”یومُ النّحر،یومُ الاَضحٰی‘‘ یعنی قربانی کا دن اور ”عیدُ الاضحی،عید قُرباں اوربقرعید“ کہا جاتا ہے۔اسی دن دوسری عید یعنی عید الاضحیٰ منائی جاتی ہے، اور یہ دن مسلمانوں کا دوسرا مذہبی تہوار ہے۔

اسلامی تہوار؛عیدالفطر اور عیدالاضحیٰ:

رسول ﷺ کا ارشاد ہے:
اِنَّ لِکُلِّ قَوْمٍ عِیْدًا وَھٰذَا عِیْدُنَا۔ (رواہ البخاری)
ترجمہ: ہر قوم کی (کوئی نہ کوئی) عید ہوتی ہے اور ہماری عید یہ ہے۔ (بخاری)
حضرت مولانا محمد منظور نعمانیؒ تحریر فرماتے ہیں:
”ہر قوم کے کچھ خاص تہوار اور جشن کے دن ہوتے ہیں، جن میں اُس قوم کے لوگ اپنی اپنی حیثیت اور سطح کے مطابق اچھا لباس پہنتے اور عمدہ کھانے پکاتے اور کھاتے ہیں، اور دوسرے طریقوں سے بھی مسرت و خوشی کا اظہار کرتے ہیں یہ گویا انسانی فطرت کا تقاضا ہے؛ اسی لیے انسانوں کا کوئی طبقہ اور فرقہ ایسا نہیں ہے جس کے یہاں تہوار اور جشن کے کچھ خاص دن نہ ہوں۔اسلام میں بھی ایسے دو دن رکھے گئے ہیں؛ ایک عیدالفطر اور دوسرے عیدالاضحی، بس یہی مسلمانوں کے اصلی مذہبی و ملّی تہوار ہیں۔ ان کے علاوہ مسلمان جو تہوار مناتے ہیں ان کی کوئی مذہبی حیثیت اور بنیاد نہیں ہے؛ بلکہ اسلامی نقطۂ نظر سے ان میں سے اکثر خرافات ہیں۔
مسلمانوں کی اجتماعی زندگی اُس وقت سے شروع ہوتی ہے جب کہ رسول اللہ ﷺ ہجرت فرماکر مدینہ طیبہ آئے۔ عیدالفطر اور عیدالاضحی ان دونوں تہواروں کا سلسلہ بھی اُسی وقت سے شروع ہواہے۔جیسا کہ معلوم ہے عیدالفطر رمضان المبارک کے ختم ہونے پر یکم شوال کومنائی جاتی ہے اور عیدالاضحی ۱۰/ ذوالحجہ کو۔رمضان المبارک دینی وروحانی حیثیت سے سال کے بارہ مہینوں میں سب سے مبارک مہینہ ہے، اسی مہینہ میں قرآن مجید نازل ہونا شروع ہوا، اسی پورے مہینے کے روزے امت مسلمہ پر فرض کیے گئے، اس کی راتوں میں ایک مستقل باجماعت نماز(تراویح) کا اضافہ کیا گیا ہے، اور ہر طرح کی نیکیوں میں اضافہ کی ترغیب دی گئی ۔ الغرض یہ پورا مہینہ خواہشات کی قربانی اور مجاہدہ کا اور ہر طرح کی طاعات و عبادات کی کثرت کا مہینہ قرار دیاگیا، ظاہر ہے کہ اس مہینے کے خاتمہ پر جو دن آئے ایمانی وروحانی برکتوں کے لحاظ سے وہی سب سے زیادہ اس کا مستحق ہے کہ اس کو اس امت کے جشن و مسرت کا دن اور تہوار بنایاجائے، چنانچہ اسی دن کو عیدالفطر قرار دیا گیا۔
 اور ۱۰/ ذوالحجہ وہ مبارک تاریخی دن ہے جس میں امت مسلمہ کے مُؤسِّس و مُورِثِ اعلیٰ سیدنا حضرت ابراہیم خلیل اللہ علیہ الصلوٰۃ و السلام نے اپنی دانست میں اللہ تعالیٰ کا حکم و اشارہ پا کر اپنے لخت جگر سیدنااسماعیل علیہ السلام کو ان کی رضامندی سے قربانی کے لیے اللہ کے حضور میں پیش کرکے اور ان کے گلے پر چھری رکھ کر اپنی سچی وفاداری اور کامل تسلیم و رضا کا ثبوت دیا تھا اور اللہ تعالیٰ نے عشق و محبت اور قربانی کے اس امتحان میں ان کو کامیاب قرار دے کر حضرت اسماعیل علیہ السلام کو زندہ و سلامت رکھ کر ان کی جگہ ایک جانور کی قربانی قبول فرمالی تھی، اور حضرت ابراہیم علیہ السلام کے سر پر ”اِنِّیْ جَاعِلُکَ لِلنَّاسِ اِمَامًا“ (میں تم کو لوگوں کا پیشوا بناؤں گا) کا تاج رکھ دیا تھا، اور ان کی اس ادا کی نقل کو قیامت تک کے لیے “رسمِ عاشقی“ قرار دے دیا تھا، پس اگر کوئی دن کسی عظیم تاریخی واقعہ کی یادگار کی حیثیت سے تہوار قرار دیا جاسکتا ہے تو اس امت مسلمہ کےلیے جو مِلَّتِ ابراہیمی کی وارث اور اُسوۂ خلیلی کی نمائندہ ہے ۱۰/ ذی الحجہ کے دن کے مقابلے میں کوئی دوسرا دن اس کا مستحق نہیں ہوسکتا؛ اس لیے دوسری عید ۱۰/ ذی الحجہ کو قرار دیا گیا۔جس وادی غیر ذِی زَرع(بے آب و گیاہ) میں حضرت اسماعیل علیہ السلام کی قربانی کا یہ واقعہ پیش آیا تھا اُسی وادی میں پورے عالَمِ اسلامی کا حج کا سالانہ اجتماع اور اُس کے مَناسِک قربانی وغیرہ اس واقعہ کی گویا اصل اور اوّل درجے کی یادگار ہے، اور ہراسلامی شہر اور بستی میں عیدالاضحیٰ کی تقریبات نماز اور قربانی وغیرہ بھی اسی کی گویا نقل اور دوم درجہ کی یادگار ہے۔ بہرحال ان دونوں (یکم شوال اور ۱۰/ ذی الحجہ) کی ان خصوصیات کی وجہ سے ان کو یومُ العید اور امت مسلمہ کا تہوار قرار دیاگیا۔“(معارف الحدیث حصہ سوم صفحہ ۲۳۸،۲۳۹)
حضرت الاستاذ مفتی سعید احمد پالنپوریؒ سابق شیخ الحدیث دارالعلوم دیوبند فرماتے ہیں:
”دنیامیں ہر قوم کے لیے خوشی کا کوئی دن ہوتا ہے ، اللہ عزّ وجلّ نے اس امت کے لیے خوشی کے دو دن مقرر فرکیے ہیں: عیدا لاضحیٰ اور عید الفطر، مگر مسلمانوں کا طریقہ دیگر اَقوام سے مختلف ہے، اسلام نے خوشی کے دنوں میں بھی سب سے پہلا کام عبادت مقرر کیا ہے، دوسری قومیں خوشی کے دنوں میں شور شرابا کرتی ہیں، وہ کوئی عبادت نہیں کرتیں، ہم سب سے پہلے دوگانہ اداکرتے ہیں۔۔۔۔۔پھر چونکہ یہ دونوں دن سُرور و انبساط (خوشی) کے دن ہیں اس لیے دیگر خوشی کے کام بھی جائز ہیں؛ بلکہ ایسے کام جو گونہ مناسب نہیں اُن سے بھی صرفِ نظر کی جاتی ہے۔“ (تحفۃ القاری شرح بخاری جلد ۳ ص۲۸۰)
(جاری)

Friday, June 16, 2023

अहकामे ज़िल्हिज्जा

अहकामे ज़िल्हिज्जा

(पहली क़िस्त)

🖊️ ज़ैनुल आबिदीन क़ासमी
ख़ादिम जामिया क़ासमिया अशरफ़ुल उलूम नवाबगंज अलियिबाद ज़िला बहराइच
9670660363

ज़ुल्हिज्जा:

इस्लामी/हिज्री कैलेंडर का बारहवाँ और आख़िरी महीना ज़ुल्हिज्जा है, यह महीना उन तीन महीनों में से एक है जिनको “अश्हुरे हज” (हज के महीने) कहा जाता है।

फ़ायदा: शव्वाल, ज़ुल्क़ादा और ज़ुल्हिज्जा के दस दिन“अश्हुरे हज” (हज के महीने) कहे जाते हैं।

इसी तरह ज़ुल्हिज्जा उन चार महीनों में से एक है जिनको “अश्हुरे हुरुम” (अज़्मत व हुर्मत वाले महीने) कहा जाता है।

फ़ायदा: ज़ुल्क़ादा, ज़ुल्हिज्जा, मुहर्रम और रजब “अश्हुरे हुरुम” (अज़्मत व हुर्मत वाले महीने) कहे जाते हैं।

ज़ुल्हिज्जा के महीने से इस्लाम की तीन ऐसी इबादतें मुतअल्लिक़ हैं जो साल में एक बार और इसी महीने में आती हैं।

एक तो इस्लाम का आख़िरी और तक्मीली रुक्न “हज”
दूसरी “नमाज़े ईदुल अज़्हा”
और तीसरी “क़ुर्बानी” है।

अशरा-ए-ज़िल्हिज्जा:

इस महीना के शुरू वाले दस दिनों यानी पहली तारीख़ से दस तारीख़ तक को “अशरा-ए-ज़िल्हिज्जा” कहा जाता है , इन दस दिनों को ख़ास फ़ज़ीलत हासिल है।

क़ुरआने करीम के तीसवें पारे की सूरह-ए-फ़ज्र में इन दस रातों की क़सम खाई गई है:

हज़रत मौलाना अशरफ़ अली थानवी (रहि०) इस आयते करीमा का तफ़्सीरी तर्जुमा यूं फ़रमाते हैं:

“क़सम है फ़ज्र (के वक़्त) की, और (ज़िल्हिज्जा की) दस रातों (यानी दस तारीख़ों) की (कि वो निहायत फ़ज़ीलत वाली हैं...) और जुफ़्त की और ताक़ की (जुफ़्त से मुराद दसवीं तारीख़ ज़िल्हिज्जा की और ताक़ से नवीं तारीख़...)” (तफ़्सीर बयानुल क़ुरआन जिल्द 3 पेज 654)

हज़रत मुफ़्ती मुहम्मद शफ़ी उस्मानी साहब (रहि०) इस आयते करीमा की तफ़्सीर में फ़रमाते हैं:

“लयालिन अश॒र् यानी दस रातें, हज़रत इब्ने अब्बास रज़ि०, क़तादा, मुजाहिद, सुद्दी, ज़ह्हाक, कल्बी अइम्मा-ए-तफ़्सीर के नज़्दीक ज़िल्हिज्जा की इब्तिदाई दस रातें मुराद हैं; क्यूंकि हदीस में इनकी बड़ी फ़ज़ीलत आई है ........ और अबुज़्ज़बैर ने हज़रत जाबिर रज़ि० से रिवायत किया है कि ख़ुद रसूलुल्ला सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने व ल यालिन अश॒र् की तफ़्सीर में फ़रमाया कि इस से मुराद अशरा-ए-ज़िल्हिज्जा है।”(मआरिफ़ुल क़ुरआन 8/739)

हज़रत मुफ़्ती मुहम्मद तक़ी उस्मानी साहब फ़रमाते हैं:

“और दस रातों से मुराद ज़ुल्हिज्जा के महीने की पहली दस रातें हैं जिनको अल्लाह तआला ने ख़ुसूसी तक़द्दुस अता फ़रमाया है, और
उस में इबादत का बहुत सवाब है। जुफ़्त से मुराद 10 ज़ुल्हिज्जा का दिन और ताक़ से मुराद अर्फ़े का दिन है जो 9/ज़ुल्हिज्जा को आता है। इन अय्याम (दिनों) की क़सम खाने से उनकी अहमियत और फ़ज़ीलत की तरफ़ इशारा है।” (आसान तर्जुमा-ए-क़ुरआन 3/1922)

हदीस शरीफ़ में भी इन दस दिनों की बड़ी फ़ज़ीलत आई है:

हज़रत इब्ने अब्बास रज़ि० से रिवायत है कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया:

“नहीं है कोई भी दिन जिस में नेक अमल अल्लाह तआला को ज़्यादा पसंद हो इन दस दिनों से (यानी अल्लाह तआला को सबसे ज़्यादा पसंद इन दस दिनों के आमाल हैं; अल्बत्ता इस से रमज़ान मुस्तस्ना (अलग) है, जैसे बअज़ हदीसों में नवाफ़िल की फ़ज़ीलत आई है उनसे फ़र्ज़ वाजिब और सुनने मुअक्कदा मुस्तस्ना हैं) लोगों ने पूछा: ऐ अल्लाह के रसूल! अल्लाह के रास्ते में जिहाद करना भी? (यानी इन दस दिनों के अलावा दिनों में अगर अल्लाह के रास्ते में जिहाद किया जाये तो क्या वो भी अल्लाह को ज़्यादा पसंद नहीं? रसूलुल्ला सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया: अल्लाह के रास्ते में जिहाद करना भी, मगर यह कि कोई शख़्स अपनी जान और अपने माल के साथ निकले और उनमें से कुछ भी लेकर वापस ना आए (यानी शहीद हो जाए तो उस का जिहाद अशरा-ए-ज़िल्हज्जा के अमल से अफ़्ज़ल होगा, रहा वो मुजाहिद जो जिहाद से सही सलामत वापस आ गया या दूसरे के तआवुन से जिहाद में गया और शहीद हो गया तो उस का जिहाद इन दस दिनों के अमल से अफ़्ज़ल नहीं होगा)।” (तोहफ़तुल अल्मई शरह तिर्मिज़ी जिल्द 3 पेज 131)

हज़रत मौलाना मन्ज़ूर नोमानी रहि० तहरीर फ़रमाते हैं:

“जिस तरह अल्लाह तआला ने हफ़्ता के सात दिनों में से जुमा को , और साल के बारह महीनों में से रमज़ान मुबारक को और रमज़ान के तीन अशरों में से अशरा-ए-अख़ीर यानी रमज़ान के आख़िरी दस दिनों को ख़ास फ़ज़ीलत बख़्शी है इसी तरह ज़ुल्हिज्जा के पहले अशरा (यानी शुरू के दस दिनों) को भी फ़ज़्ल-व-रहमत का ख़ास अशरा क़रार दिया है, बहर हाल यह रहमते ख़ुदावंदी का ख़ास अशरा है, इन दिनों में बन्दे का हर नेक अमल अल्लाह तआला को बहुत महबूब (पसंद) है, और उस की बड़ी क़ीमत है।” मआरिफ़ुल हदीस जिल्द 3 पेज 417/418)

एक दूसरी हदीस में आँहज़रत सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया:

“किसी भी दिन में इबादत करना अल्लाह को इतना महबूब (पसंदीदा) नहीं जितना अशरा-ए-ज़िल्हिज्जा में इबादत करना महबूब है। (यानी इन दिनों की इबादत अल्लाह तआला को दूसरे दिनों की इबादत से ज़्यादा महबूब है) इस अशरा के हर दिन का रोज़ा साल भर के रोज़ों के बराबर है और इस की हर रात की नफ़्लें शबे क़द्र की नफ़्लों के बराबर हैं।” (तिर्मिज़ी, इब्ने माजा)

हज़रतुल उस्ताज़ मुफ़्ती सईद अहमद पालन पूरी साबिक़ शैख़ुल हदीस दारुल उलूम देवबंद फ़रमाते हैं:

“अशरा-ए-ज़िल्हिज्जा के रोज़े बिल्इज्मा मुस्तहब हैं , और अशरा से मुराद ज़िल्हिज्जा के शुरू के नौ दिन हैं, दसवाँ दिन मुराद नहीं; इसलिए कि वो ईदुल अज़्हा का दिन है उस में रोज़ा हराम है।”
(तोहफ़तूल अल्मई 3/129,130)

(जारी)

احکامِ ذی الحجہ

احکامِ ذی الحجہ

(پہلی قسط)

🖊️ زین العابدین قاسمی
خادم جامعہ قاسمیہ اشرف العلوم نواب گنج علی آباد ضلع بہرائچ
9670660363

ذوالحجہ:

اسلامی/ہجری کیلنڈرکا بارہواں اور آخری مہینہ ” ذُوالْحِجَّہ “ہے، یہ مہینہ اُن تین مہینوں میں سے ایک ہے جن کو ”اَشھُرِ حج“ (حج کے مہینے) کہا جاتا ہے۔

فائدہ: شوال، ذوالقعدہ اور ذوالحجہ کے دس دن”اَشھُرِ حج“ (حج کے مہینے) کہے جاتے ہیں۔

اِسی طرح ذوالحجہ اُن چار مہینوں میں سے ایک ہے جن کو ”اَشہُرِ حُرُم“ (عظمت و حرمت والے مہینے) کہا جاتا ہے۔

فائدہ: ذوالقعدہ، ذوالحجہ، محرم اور رجب ”اَشہُرِ حُرُم“ (عظمت و حرمت والے مہینے) کہے جاتے ہیں۔

 ذوالحجہ کے مہینے سے اسلام کی تین ایسی عبادتیں متعلق ہیں جو سال میں ایک بار اور اِسی مہینے میں آتی ہیں:

ایک تو اسلام کا آخری اور تکمیلی رکن ”حج“
دوسری ”نماز عید الاضحیٰ“
اور تیسری ”قربانی“ ہے۔

عشرۂ ذی الحجہ:

اس مہینہ کے شروع والے دس دنوں یعنی پہلی تاریخ سے دس تاریخ تک کو ”عشرۂ ذِی الحجہ “ کہاجاتا ہے ، ان دس دنوں کو خاص فضیلت حاصل ہے۔

قرآن کریم میں ان دس راتوں کی قسم کھائی گئی ہے۔ 
ارشاد باری تعالیٰ ہے:
وَالْفَجْرِ ۝ وَلَیَالٍ عَشْرٍ ۝ وَّالشَّفْعِ وَالْوَتْرِ۝ (سورۂ فجر)

حضرت مولانا اشرف علی تھانویؒ اس آیت کریمہ کا تفسیری ترجمہ یوں فرماتے ہیں:

”قسم ہے فجر (کے وقت) کی، اور (ذی الحجہ کی) دس راتوں (یعنی دس تاریخوں ) کی (کہ وہ نہایت فضیلت والی ہیں۔۔۔) اور جُفت کی اور طاق کی (جفت سے مراد دسویں تاریخ ذی الحجہ کی اور طاق سے نویں تاریخ۔۔۔)“ (تفسیر بیان القرآن جلد ۳ ص ۶۵۴)

حضرت مفتی محمد شفیع عثمانی صاحبؒ اس آیت کریمہ کی تفسیر میں فرماتے ہیں:

”لَیَالٍ عَشْرٍ یعنی دس راتیں، حضرت ابن عباسؓ، قتادہ، مجاہد، سُدّی، ضحاک، کلبی ائمۂ تفسیر کے نزدیک ذی الحجہ کی ابتدائی دس راتیں مراد ہیں؛ کیونکہ حدیث میں ان کی بڑی فضیلت آئی ہے۔ ۔۔ ۔۔۔اور ابوالزبیر نے حضرت جابرؓ سے روایت کیا ہے کہ خود رسول اللہﷺ نے وَالْفَجْرِ وَلَیَالٍ عَشْرٍ کی تفسیر میں فرمایا کہ اس سے مراد عشرۂ ذی الحجہ ہے۔“(معارف القرآن ۸ /۷۳۹)

حضرت مفتی محمد تقی عثمانی صاحب فرماتے ہیں:

”اور دس راتوں سے مراد ذوالحجہ کے مہینے کی پہلی دس راتیں ہیں جن کو اللہ تعالیٰ نے خصوصی تقَدُّس عطا فرمایا ہے، اور اس میں عبادت کا بہت ثواب ہے۔ جفت سے مراد ۱۰/ ذوالحجہ کا دن اور طاق سے مراد عرفے کا دن ہے جو ۹/ذو الحجہ کو آتا ہے۔ اِن ایام کی قسم کھانے سے ان کی اہمیت اور فضیلت کی طرف اشارہ ہے۔“ (آسان ترجمۂ قرآن ۳/۱۹۲۲)

 حدیث شریف میں بھی ان دس دنوں کی بڑی فضیلت آئی ہے۔

حضرت ابنِ عباسؓ سے روایت ہے کہ رسول اللہ ﷺ نے فرمایا:
مَامِنْ اَیَّامٍ الْعَمَلُ الصَّالِحُ فِیْهِنَّ اَحَبُّ اِلَی اللہِ مِنْ ھٰذِہِ الْاَیَّامِ الْعَشْرِ، فَقَالُوْا یَارَسُوْلَ اللہِ! وَلَا الْجِھَادُ فِیْ سَبِیْلِ اللہِ؟ فَقَالَ رَسُوْلُ اللہﷺ: وَلَا الْجِھَادُ فِیْ سَبِیْلِ اللہِ، اِلَّا رَجُلٌ خَرَجَ بِنَفْسِہٖ وَمَالِہٖ فَلَمْ یَرْجِعْ مِنْ ذٰلِکَ بِشَیْئٍ۔ (رواہُ الترمذی)

ترجمہ: نہیں ہے کوئی بھی دن جس میں نیک عمل اللہ تعالیٰ کو زیادہ پسند ہو ان دس دنوں سے (یعنی اللہ تعالیٰ کو سب سے زیادہ پسند ان دس دنوں کے اعمال ہیں؛ البتہ اس سے رمضان مستثنیٰ ہے، جیسے بعض حدیثوں میں نوافل کی فضیلت آئی ہے ان سے فرض واجب اور سنن مؤکدہ مستثنیٰ ہیں) لوگوں نے پوچھا: اے اللہ کے رسول! اللہ کے راستے میں جہاد کرنا بھی؟ (یعنی ان دس دنوں کے علاوہ دنوں میں اگر اللہ کے راستے میں جہاد کیا جائے تو کیا وہ بھی اللہ کو زیادہ پسند نہیں؟) رسول اللہﷺ نے فرمایا: اللہ کے راستے میں جہاد کرنا بھی، مگر یہ کہ کوئی شخص اپنی جان اور اپنے مال کے ساتھ نکلے اور ان میں سے کچھ بھی لے کر واپس نہ آئے (یعنی شہید ہوجائے تو اس کا جہاد عشرۂ ذی الحجہ کے عمل سے افضل ہوگا، رہا وہ مجاہد جو جہاد سے صحیح سلامت واپس آگیا یا دوسرے کے تعاون سے جہاد میں گیا اور شہید ہوگیا تو اس کا جہاد ان دس دنوں کے عمل سے افضل نہیں ہوگا)۔ (تحفۃ الامعی شرح ترمذی ج۳ ص۱۳۱)

حضرت مولانا منظور نعمانیؒ تحریر فرماتے ہیں :
 ”جس طرح اللہ تعالی نے ہفتہ کے سات دنوں میں سے جمعہ کو ، اور سال کے بارہ مہینوں میں سے رمضان مبارک کو اور رمضان کے تین عشروں میں سے عشرۂ اخیر ( یعنی رمضان کے آخری دس دنوں ) کو خاص فضیلت بخشی ہے اسی طرح ذوالحجہ کے پہلے عشرہ ( یعنی شروع کے دس دنوں) کو بھی فضل و رحمت کا خاص عشرہ قرار دیا ہے،بہر حال یہ رحمتِ خداوندی کا خاص عشرہ ہے، ان دنوں میں بندے کا ہر نیک عمل اللہ تعالی کو بہت محبوب (پسند) ہے، اور اس کی بڑی قیمت ہے۔( مَعَارِفُ الحدیث جلد ۳، صفحہ ۴۱۷، ۴۱۸)

 ایک دوسری حدیث میں آں حضرت ﷺ نے فرمایا:
مَا مِنْ اَیَّامٍ اَحَبُّ اِلَی اللہِ اَنْ یُّتَعَبَّدَ لَہٗ فِیْھَا مِنْ عَشْرِ ذِی الْحِجَّۃِ یَعْدِلُ صِیَامُ کُلِّ یَوْمٍ مِّنْھَا بِصِیَامِ سَنَۃٍ وَقِیَامُ کُلِّ لَیْلَۃٍ مِنْھَا بِقِیَامِ لَیْلَۃِ الْقَدْرِ۔ (رواہ الترمذی وابن ماجۃ)

ترجمہ:کسی بھی دن میں عبادت کرنا اللہ کو اتنا محبوب (پسندیدہ) نہیں جتنا عشرۂ ذی الحجہ میں عبادت کرنا محبوب ہے۔(یعنی ان دنوں کی عبادت اللہ تعالیٰ کو دوسرے دنوں کی عبادت سے زیادہ محبوب ہے) اس عشرہ کے ہر دن کا روزہ سال بھر کے روزوں کے برابر ہے اور اس کی ہر رات کی نفلیں شب قدر کی نفلوں کے برابر ہے۔(ترمذی، ابن ماجہ)

حضرت الاستاذ مفتی سعید احمد پالنپوریؒ سابق شیخ الحدیث دارالعلوم دیوبند فرماتے ہیں:

”عشرۂ ذی الحجہ کے روزے بالاجماع مستحب ہیں ، اور عشرہ سے مراد ذی الحجہ کے شروع کے نودن ہیں، دسواں دن مراد نہیں؛ اس لیے کہ وہ عید الاضحیٰ کا دن ہے اس میں روزہ حرام ہے“
(تحفۃ الالمعی ۳ / ۱۲۹، ۱۳۰)

(جاری)

Sunday, January 8, 2023

मुस्लिम‌ समाज में ग़रीबों की ज़िंदगी पुर सुकून बनाने के लिए इस्लामी निज़ाम

मुस्लिम‌ समाज में ग़रीबों की ज़िंदगी पुर सुकून बनाने के लिए इस्लामी निज़ाम

🖊️ जैनुल आबिदीन क़ासमी

ख़ादिम जामिया क़ासमिया अशरफ़ुल उलूम नवाबगंज अलियाबाद जि० बहराइच यू०पी

क़ुरआने करीम एक ऐसी किताब है जिसने इन्सानों के पस्मांदा, दबे कुचले और ग़रीब तब्क़ा का बड़ा ख़्याल रखा है, चुनांचे उन‌की दुनियावी ज़िंदगी को पुर सुकून और राहत वाली ज़िंदगी बनाने के लिए मालदारों पर हुक़ूक़ मुक़र्रर करके उन की अदाइगी का हुक्म भी दिया है।

यह और बात है कि मालदारों ने उन हुक़ूक़ की अदाइगी का जिस तरह एहतिमाम करना चाहिए नहीं किया जिसकी वजह से आज मुस्लिम समाज में कितने लोग ग़ुर्बत की वजह से परेशान रहते हैं, कोई खाने पहेनने का मुहताज है, किसी के पास रहने के लिए मुनासिब मकान नहीं है, कोई दवा ईलाज के लिए पैसों का मुहताज है, कोई पैसों के ना होने की वजह से अपने बच्चों को अच्छी तालीम (शिक्षा) नहीं दे पा रहा है, कोई पैसे ना होने की वजह से कारोबार नहीं कर पा रहा है ग़र्ज़ ग़ुर्बत की वजह से एक ग़रीब आदमी मुख़्तलिफ़ तरीक़ों से परेशान रहता है।

जो आदमी ग़रीब होता है तो ऐसा तो है नहीं कि उस के सारे रिश्तेदार भी ग़रीब ही हूँ। अगर एक आदमी ग़रीब है तो उस के दसियों रिश्तेदार मालदार भी होते हैं।

अब उन मालदारों को अल्लाह तआला ने क़ुरआने करीम में दो जगह हुक्म दिया है कि
तुम रिश्तेदार को उस का हक़ दो

एक जगह पंद्रहवें पारे में सूरह-ए-बनी इसराईल की छब्बीसवीं आयत में हुक्म दिया:
(और तुम रिश्तेदार को उस का हक़ दो)

दूसरी जगह इक्कीसवें पारे में सूरह-ए-रुम की अड़तीसवीं आयत में हुक्म दिया:
(लिहाज़ा तुम रिश्तेदार को उस का हक़ दो)

इन‌ दोनों आयाते करीमा में अल्लाह ने जिस हक़ को देने का हुक्म दिया है उस से मुराद माली हक़ है।

यानी अल्लाह तआला ने मालदारों के माल में उन के ग़रीब रिश्तेदारों का भी हक़ रखा है, और फिर मालदारों को ये हुक्म भी दिया है कि ग़रीब रिश्तेदार को उस का हक़ दो।

और ये हक़ ऐसा है जो हुक़ूक़ुल इबाद मैं आता है, और हुक़ूक़ुल ईबाद का मुआमला ऐसा है कि जब तक हक़ वाला माफ़ न करे अल्लाह तआला भी माफ़ नहीं फ़रमाएँगे। यानी अगर मालदार अपने माल में से अपने ग़रीब रिश्तेदार को न दे तो वो मालदार इतना बड़ा मुज्रिम है कि जब तक वो ग़रीब रिश्तेदार माफ़ न करे अल्लाह तआला उस मालदार को माफ़ नहीं फ़रमाएँगे, और ग़रीब रिश्तेदार के हक़ के बराबर मालदार की नेकियां ग़रीब को दे दी जाएँगी, और अगर मालदार के पास ग़रीब के हक़ के बराबर नेकियां नहीं होंगी तो ग़रीब के गुनाह मालदार के ऊपर लाद दिया जाएगा।

लिहाज़ा कोई मालदार ये न समझे कि ये मेरा माल है, और इस में सिर्फ मेरा ही हक़ है, मैं जिस तरह चाहूँ ख़र्च करूँ, नहीं, नहीं, ये माल अल्लाह का दिया हुआ है, और इस को उसी तरह ख़र्च करना है जैसा अल्लाह ने हुक्म दिया है, और इस‌ माल में अल्लाह ने जिन जिन का हक़ रखा है उन को देना पड़ेगा, इस माल में अल्लाह ने ग़रीब रिश्तेदार का भी हक़ रखा है, इसलिए अपने माल में से ग़रीब रिश्तेदार को देना होगा।

यहाँ एक और बात ग़ौर करने की है कि मालदारों के माल में ग़रीब रिश्तेदार का हक़ है मगर ग़रीब रिश्तेदार को ये हुक्म नहीं दिया गया है कि मालदार रिश्तेदारों के पास जाकर अपना हक़ मांगे; बल्कि मालदारों को हुक्म दिया गया है कि तुम अपने ग़रीब रिश्तेदार को उस का हक़ दो। लिहाज़ा मालदारों की ये ज़िम्मेदारी है कि वो अपने ग़रीब रिश्तेदार तक उस का हक़ पहुंचाएं, मालदार इस इंतिज़ार में हरगिज़ न रहें कि ग़रीब रिश्तेदार मांगने आए तब उस को देंगे; बल्कि ग़रीब रिश्तेदार आए या न आए मालदार ख़ुद उस का हक़ उस तक पहुंचाए। क्यूँकि ग़रीब रिश्तेदार को अपना हक़ मांगने का हुक्म नहीं है बल्कि मालदारों को हुक्म है कि वो ग़रीब रिश्तेदार का हक़ उस को दें।

इसी लिए अगर ग़रीब अपने मालदार रिश्तेदारों के पास अपना हक़ मांगने न जाये और ग़ुर्बत में ज़िंदगी गुज़ार कर चला जाये तो क़ियामत के दिन उस से ये पूछगछ नहीं होगी कि तुम अपने मालदार रिश्तेदार के पास अपना हक़ मांगने क्यों नहीं गए थे; लेकिन अगर मालदार अपने ग़रीब रिश्तेदार को उस का हक़ न दे और वो ग़ुर्बत की ज़िंदगी में परेशान रहे तो क़ियामत के दिन मालदार से पूछगछ होगी कि तुम‌ने अपने ग़रीब रिश्तेदार का हक़ क्यों नहीं अदा किया था।

अब अगर क़ुरआने करीम के इस हुक्म पर अमल करते हुए हर मालदार अपने ग़रीब रिश्तेदार को उस का हक़ देने लगे, और उस की ज़रूरियात का ख़्याल रखने लगे तो समाज में कोई भी ग़रीब परेशान हाल नहीं रहेगा; क्यूँकि हर ग़रीब आदमी के दसियों रिश्तेदार मालदार होते हैं, हर मालदार थोड़ा थोड़ा भी अपने ग़रीब रिश्तेदार को देने लगे तो उस की परेशानियाँ दूर हो जाएंगी, उस की ज़िंदगी भी पुर सुकून बन जाएगी, और दर-दर की ठोकरें खाने और गिरी हुई नज़रों से देखे जाने से भी बचा रहेगा।

और अगर मान लो कि कोई ग़रीब आदमी ऐसा है जिसके रिश्तेदारों में कोई मालदार नहीं है तो ऐसे अज्नबी ग़रीब का हक़ भी मालदारों के माल में है, ऊपर की दोनों आयतों में रिश्तेदार का हक़ देने का‌ हुक्म देने के बाद आगे मिस्कीनों (ग़रीबों) को देने का हुक्म दिया है।

लिहाज़ा मालदारों पर फ़र्ज़ है कि वह हर ग़रीब की मदद और उस का तआवुन करें, वो ग़रीब चाहे अपना रिश्तेदार हो या अज्नबी।

और ग़रीबों की मदद करने से मालदार क़ियामत के दिन अल्लाह की पकड़ से भी बचेगा और दुनिया में उस के माल में बरकत भी होगी और वो कभी ग़रीब नहीं होगा।

शैख़ुल इस्लाम हज़रत मुफ़्ती मुहम्मद तक़ी उस्मानी साहब सूरह-ए-रुम वाली आयते करीमा की तफ़सीर में लिखते हैं:

“पिछली आयत में बताया गया था कि रिज़्क़ तमामतर अल्लाह तआला की अता है, इसलिए जो कुछ उसने अता फ़रमाया है वो उसी के हुक्म और हिदायत के मुताबिक़ ख़र्च होना चाहिए, लिहाज़ा इस में ग़रीबों मिस्कीनों और रिश्तेदारों के जो हुक़ूक़ अल्लाह तआला ने मुक़र्रर फ़रमाए हैं वह उनको देना ज़रूरी है, और देते वक़्त ये अंदेशा नहीं होना चाहिए कि इस से माल में कमी आ जाएगी, क्यूँकि जैसा कि पिछली आयत में फ़रमाया गया रिज़्क़ की कुशादगी और तंगी अल्लाह तआला ही के क़ब्ज़े में है वो तुम्हें हुक़ूक़ की अदाइगी के बाद महरूम नहीं फ़रमाएगा, चुनांचे आज तक नहीं देखा गया कि हुक़ूक़ अदा करने के नतीजे में कोई मुफ़्लिस (ग़रीब) हो गया हो। (आसान तर्जुमा-ए-क़ुरआन)

अख़ीर में मैं यही अर्ज़ करूँगा कि मालदारों को चाहिए कि वो अपने रिश्तेदारों में देखें अगर कोई ग़रीब और ज़रूरतमंद है तो उस की मदद का पूरा पूरा ख़्याल रखें, और इस इंतिज़ार में हरगिज़ न रहें कि वो ग़रीब रिश्तेदार मेरे सामने अपनी ज़रूरत रखे, अपनी परेशानी बताए तब मैं उस की मदद करूँगा; क्यूँकि बहुत से ग़रीब इतने ग़ैरत मंद होते हैं कि ग़ुर्बत की वजह से बड़ी सी बड़ी तक्लीफ़ और मुसीबत बर्दाश्त कर लेते हैं लेकिन अपनी परेशानी बताकर किसी से मदद नहीं मांगते हैं। इसी लिए ग़रीबों को मांगने का हुक्म नहीं दिया गया है ताकि उन की इज़्ज़त और ग़ैरत महफ़ूज़ रहे; बल्कि मालदारों को देने का हुक्म दिया गया है।

एक साहब मेरे पास बैठे अपने किसी रिश्तेदार से फ़ोन पर बात कर रहे थे और कह रहे थे कि कोई ज़रूरत होगी तो बताना, फ़ोन रखने के बाद मुझ से कहने लगे कि ये मेरे रिश्तेदार हैं जो बहुत ग़रीब हैं, तो मैंने कहा कि फिर आप उनकी मदद कीजीए, इंतिज़ार न कीजिए कि वो अपनी ज़रूरत आप से बताएं, क्या पता उनको आप से अपनी ज़रूरत बताते हुए शर्म आती हो, इसलिए ख़ुद उनकी मदद कीजिए। उन की ग़ुर्बत ही उन की ज़रूरत है।

अल्लाह रब्बुल इज़्ज़तअमल की तौफ़ीक़ अता फ़रमाए।

16/ जुमादल आख़िरा 1444हि०
09/ जनवरी 2023 ई०
दिन सोमवार

مسلم‌ معاشرے میں غریبوں کی زندگی پُر سکون بنانے کے لیے اسلامی نظام

مسلم‌ معاشرے میں غریبوں کی زندگی پُر سکون بنانے کے لیے اسلامی نظام

🖊️ زین العابدین قاسمی
خادم جامعہ قاسمیہ اشرف العلوم نواب گنج علی آباد ضلع بہرائچ یوپی

قرآن کریم ایک ایسی کتاب ہے جس نے انسانوں کے پسماندہ، دبے کچلے اور غریب طبقہ کا بڑا خیال رکھا ہے، چنانچہ ان‌کی دنیوی زندگی کو پُر سکون اور راحت والی زندگی بنانے کے لیے مالداروں پر حقوق مقرر کرکے اُن کی ادائیگی کا حکم بھی دیا ہے۔

یہ اور بات ہے کہ مالداوں نے اُن حقوق کی ادائیگی کا جس طرح اہتمام کرنا چاہیے نہیں کیا جس کی وجہ سے آج مسلم معاشرے میں کتنے لوگ غربت کی وجہ سے پریشان رہتے ہیں، کوئی کھانے پہننے کا محتاج ہے، کسی کے پاس رہنے کے لیے مناسب مکان نہیں ہے، کوئی دوا علاج کے لیے پیسوں کا محتاج ہے، کوئی پیسوں کے نہ ہونے کی وجہ سے اپنے بچوں کو اچھی تعلیم نہیں دے پارہا ہے، کوئی پیسے نہ ہونے کی وجہ سے کاروبار نہیں کرپارہا ہے غرض غربت کی وجہ سے ایک غریب آدمی مختلف طریقوں سے پریشان رہتا ہے۔

جو آدمی غریب ہوتا ہے تو ایسا تو ہے نہیں کہ اُس کے سارے رشتے دار بھی غریب ہی ہوں۔ اگر ایک آدمی غریب ہے تو اس کے دسیوں رشتے دار مالدار بھی ہوتے ہیں۔

اب اُن مالداروں کو اللہ تعالیٰ نے قرآن کریم میں دو جگہ حکم دیا ہے کہ

”تم رشتے دار کو اُس کا حق دو“

ایک جگہ پندرہویں پارے میں سورۂ بنی اسرائیل کی چھبیسویں آیت میں حکم دیا:

وَاٰتِ ذَا الْقُرْبٰى حَقَّهٗ (اور تم رشتے دار کو اُس کا حق دو)

دوسری جگہ اکیسویں پارے میں سورۂ روم کی اڑتیسویں آیت میں حکم دیا:

فَاٰتِ ذَا الْقُرْبٰى حَقَّهٗ (لہٰذا تم رشتے دار کو اُس کا حق دو)

اِن‌دونوں آیاتِ کریمہ میں اللہ نے جس حق کو دینے کا حکم دیا ہے اُس سے مراد مالی حق ہے۔

یعنی اللہ تعالیٰ نے مالداروں کے مال میں اُن کے غریب رشتے داروں کا بھی حق رکھا ہے، اور پھر مالداروں کو یہ حکم بھی دیا ہے کہ غریب رشتے دار کو اس کا حق دو۔

اور یہ حق ایسا ہے جو ”حقوق العباد“ میں آتا ہے۔ اور حقوق العباد کا معاملہ ایسا ہے کہ جب تک حق والا معاف نہ کرے اللہ تعالیٰ بھی معاف نہیں فرمائیں گے۔ یعنی اگر مالدار اپنے مال میں سے اپنے غریب رشتے دار کو نہ دے تو وہ مالدار اتنا بڑا مجرم ہے کہ جب تک وہ غریب رشتے دار معاف نہ کرے اللہ تعالیٰ اس مالدار کو معاف نہیں فرمائیں گے، اور غریب رشتے دار کے حق کے برابر مالدار کی نیکیاں غریب کو دے دی جائیں گی، اور اگر مالدار کے پاس غریب کے حق کے برابر نیکیاں نہیں ہوں گی تو غریب کے گناہ مالدار کے اوپر لاد دیا جائے گا۔

لہٰذا کوئی مالدار یہ نہ سمجھے کہ یہ میرا مال ہے، اور اس میں صرف میرا ہی حق ہے، میں جس طرح چاہوں خرچ کروں، نہیں، نہیں، یہ مال اللہ کا دیا ہوا ہے، اور اس کو اُسی طرح خرچ کرنا ہے جیسا اللہ نے حکم دیا ہے، اور اس‌مال میں اللہ نے جن جن کا حق رکھا ہے اُن کو دینا پڑے گا، اس مال میں اللہ نے غریب رشتے دار کا بھی حق رکھا ہے، اس لیے اپنے مال میں سے غریب رشتے دار کو دینا ہوگا۔

یہاں ایک اور بات غور کرنے کی ہے کہ مالداروں کے مال میں غریب رشتے دار کا حق ہے مگر غریب رشتے دار کو یہ حکم نہیں دیا گیا ہے کہ مالدار رشتے داروں کے پاس جاکر اپنا حق مانگے؛ بلکہ مالداروں کو حکم دیا گیا ہے کہ تم اپنے غریب رشتے دار کو اس کا حق دو۔ لہٰذا مالداروں کی یہ ذمہ داری ہے کہ وہ اپنے غریب رشتے دار تک اس کا حق پہنچائیں، مالدار اِس انتظار میں ہرگز نہ رہیں کہ غریب رشتے دار مانگنے آئے تب اس کو دیں گے؛ بلکہ غریب رشتے دار آئے یا نہ آئے مالدار خود اُس کا حق اُس تک پہنچائے۔ کیوں کہ غریب رشتے دار کو اپنا حق مانگنے کا حکم نہیں ہے بلکہ مالداروں کو حکم ہے کہ وہ غریب رشتے دار کا حق اس کو دیں۔

اسی لیے اگر غریب اپنے مالدار رشتے داروں کے پاس اپنا حق مانگنے نہ جائے اور غربت میں زندگی گذار کر چلا جائے تو قیامت کے دن اس سے یہ پوچھ گچھ نہیں ہوگی کہ تم اپنے مالدار رشتے دار کے پاس اپنا حق مانگنے کیوں نہیں گئے تھے؛ لیکن اگر مالدار اپنے غریب رشتے دار کو اس کا حق نہ دے اور وہ غربت کی زندگی میں پریشان رہے تو قیامت کے دن مالدار سے پوچھ گچھ ہوگی کہ تم‌نے اپنے غریب رشتے دار کا حق کیوں نہیں ادا کیا تھا؟

اب اگر قرآن کریم کے اِس حکم پر عمل کرتے ہوئے ہر مالدار اپنے غریب رشتے دار کو اُس کا حق دینے لگے، اور اُس کی ضروریات کا خیال رکھنے لگے تو معاشرے میں کوئی بھی غریب پریشان حال نہیں رہے گا؛ کیوں کہ ہر غریب آدمی کے دسیوں رشتے دار مالدار ہوتے ہیں، ہر مالدار تھوڑا تھوڑا بھی اپنے غریب رشتے دار کو دینے لگے تو اس کی پریشانیاں دور ہوجائیں گی، اس کی زندگی بھی پُر سکون بن جائے گی، اور در در کی ٹھوکریں کھانے اور گری ہوئی نظروں سے دیکھے جانے سے بھی بچا رہے گا۔

اور اگر مان لو کہ کوئی غریب آدمی ایسا ہے جس کے رشتے داروں میں کوئی مالدار نہیں ہے تو ایسے اجنبی غریب کا حق بھی مالداروں کے مال میں ہے، اوپر کی دونوں آیتوں میں رشتے دار کا حق دینے کا‌حکم دینے کے بعد آگے مسکینوں (غریبوں) کو دینے کا حکم دیا ہے۔

لہٰذا مالداروں پر فرض ہے کہ وہ ہر غریب کی مدد اور اس کا تعاون کریں، وہ غریب چاہے اپنا رشتے دار ہو یا اجنبی۔
 
اور غریبوں کی مدد کرنے سے مالدار قیامت کے دن اللہ کی پکڑ سے بھی بچے گا اور دنیا میں اس کے مال میں برکت بھی ہوگی اور وہ کبھی غریب نہیں ہوگا۔

شیخ الاسلام حضرت مفتی محمد تقی عثمانی صاحب سورۂ روم والی آیت کریمہ کی تفسیر میں لکھتے ہیں:

”پچھلی آیت میں بتایا گیا تھا کہ رزق تمام تر اللہ تعالیٰ کی عطا ہے، اس لیے جو کچھ اس نے عطا فرمایا ہے وہ اسی کے حکم اور ہدایت کے مطابق خرچ ہونا چاہیے، لہذا اس میں غریبوں مسکینوں اور رشتہ داروں کے جو حقوق اللہ تعالیٰ نے مقرر فرمائے ہیں وہ ان کو دینا ضروری ہے، اور دیتے وقت یہ اندیشہ نہیں ہونا چاہیے کہ اس سے مال میں کمی آجائے گی، کیونکہ جیسا کہ پچھلی آیت میں فرمایا گیا رزق کی کشادگی اور تنگی اللہ تعالیٰ ہی کے قبضے میں ہے وہ تمہیں حقوق کی ادائیگی کے بعد محروم نہیں فرمائے گا، چنانچہ آج تک نہیں دیکھا گیا کہ حقوق ادا کرنے کے نتیجے میں کوئی مفلس (غریب) ہوگیا ہو۔“ (آسان ترجمۂ قرآن)

اخیر میں میں یہی عرض کروں گا کہ مالداروں کو چاہیے کہ وہ اپنے رشتے داروں میں دیکھیں اگر کوئی غریب اور ضرورت مند ہے تو اس کی مدد کا پورا پورا خیال رکھیں، اور اِس انتظار میں ہرگز نہ رہیں کہ وہ غریب رشتے دار میرے سامنے اپنی ضرورت رکھے، اپنی پریشانی بتائے تب میں اُس کی مدد کروں گا؛ کیوں کہ بہت سے غریب اتنے غیرت مند ہوتے ہیں کہ غربت کی وجہ سے بڑی سی بڑی تکلیف اور مصیبت برداشت کرلیتے ہیں لیکن اپنی پریشانی بتاکر کسی سے مدد نہیں مانگتے ہیں۔ اسی لیے غریبوں کو مانگنے کا حکم نہیں دیا گیا ہے تاکہ اُن کی عزت اور غیرت محفوظ رہے؛ بلکہ مالداروں کو دینے کا حکم دیا گیا ہے۔

ایک صاحب میرے پاس بیٹھے اپنے کسی رشتے دار سے فون پر بات کررہے تھے اور کہہ رہے تھے کہ کوئی ضرورت ہوگی تو بتانا، فون رکھنے کے بعد مجھ سے کہنے لگے کہ یہ میرے رشتے دار ہیں جو بہت غریب ہیں، تو میں نے کہا کہ پھر آپ ان کی مدد کیجیے، انتظار نہ کیجیے کہ وہ اپنی ضرورت آپ سے بتائیں، کیا پتا ان کو آپ سے اپنی ضرورت بتاتے ہوئے شرم آتی ہو، اس لیے خود ان کی مدد کیجیے۔ اُن کی غربت ہی اُن کی ضرورت ہے۔

اللہ ربّ العزت عمل کی توفیق عطا فرمائے۔

۱۶/جمادی الآخرہ ۱۴۴۴؁ھ
۹/ جنوری ۲۰۲۳؁ء
روزِ دوشنبہ