अहले इल्म की ज़िम्मेदारी है कि अवाम को सही शरई मसला बताएं!
🖊️ ज़ैनुल आबिदीन क़ासमी
ख़ादिम जामिया क़ासमिया अशरफ़ुल उलूम नवाबगंज अलियाबाद ज़िला बहराइच
कल बाद नमाज़े अस्र एक साहब का फ़ोन आया, मुलाक़ात की दरख़ास्त की, वो उस वक़्त अपनी दुकान पर थे, मैं मदरसा में किसी काम में मसरूफ़ था, इसलिए दुकान पर जाने से माज़िरत करली, तो उन्हों ने मग़रिब बाद अपने दौलत ख़ाने पर बुलाया, मैं वहां पहुँचा, बात शुरू हुई।
दर असल चार पाँच दिन पहले उन की शादी शुदा बहन का इंतिक़ाल हुआ था (अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त उनकी मग़फ़िरत फ़रमाए) उन की पर्स में कुछ रक़म मिली थी, वो पूरी रक़म उन के ईसाले सवाब के लिए हमारे मदरसे में तामीरी काम में ख़र्च करने के लिए देना चाह रहे थे, और इसी मक़्सद से मुझे बुलाया था।
वो ये समझ रहे थे कि ये रक़म मेरी बहन ही का है, तो लाओ उन के ईसाले सवाब के लिए मदरसे में लगा दूँ, उन को सवाब पहुंचता रहेगा। और उन्हों ने ये भी बताया कि बहनोई साहब से भी बात हो गई है वो भी इस पर राज़ी हैं।
मुझे ये बात मालूम थी कि मरहूमा के वालिद भी ज़िन्दा हैं, और मरहूमा के तीन छोटे छोटे बच्चे भी हैं।
तो मैंने उन को बताया कि आप यह रक़म ऐसे नहीं दे सकते हैं, इस में कई लोगों का हिस्सा है, उन के दर्मियान यह रक़म तक़्सीम होगी, फिर उन में से बालिग़ लोग अपना हिस्सा चाहें तो मरहूमा के ईसाले सवाब के लिए दे सकते हैं, मगर नाबालिग़ का हिस्सा नहीं दे सकते हैं।
चूँकि मैं मुफ़्ती नहीं हूँ इसलिए अगर कोई अहम मसला होता है तो मालूम होने के बावुजूद भी मैं किसी मुफ़्ती साहब से पहले समझ लेता हूँ, चुनांचे मैंने एक मुफ़्ती साहब से रुजू किया।
फिर मरहूमा के भाई को मैंने बताया कि चूँकि आपकी मरहूमा बहन के पीछे उन के वालिद, शौहर और तीन बेटे हैं, इसलिए वो पूरी रक़म चौबीस हिस्सों में तक़्सीम होगी, फिर छठा हिस्सा यानी चार हिस्से वालिद को, चौथा हिस्सा यानी छः हिस्से शौहर को और बक़िया रक़म बराबर बराबर तीनों बेटों को मिलेंगे।
अब वालिद और शौहर चाहें तो अपना अपना हिस्सा दे सकते हैं बाक़ी तीनों बच्चों का हिस्सा नहीं दे सकते, इसलिए कि वो नाबालिग़ हैं और नाबालिग़ के माल में किसी को भी तसर्रुफ़ का हक़ नहीं होता है।
वो रक़म चूँकि 5240 रुपये थी, इसलिए वालिद को छठा हिस्सा यानी 873 रुपये, शौहर को चौथा हिस्सा यानी 1310 रुपये और बक़िया 3055 रुपये में से तीनों बच्चों को बराबर बराबर मिले।
इस के बाद वालिद और शौहर दोनों ने अपने अपने हिस्से यानी 2183 रुपये मदरसे में ईसाले सवाब के लिए दे दिए।
अगर मैं उन्हें शरई मसला न बताता तो वो पूरी रक़म मदरसे में दे रहे थे।
फिर मैंने उन्हें ये भी बताया कि सिर्फ यही रक़म तक़्सीम नहीं होगी; बल्कि मरहूमा ने जो भी छोड़ा होगा, रुपये और जे़वरात सब इसी तरह तक़्सीम होंगे।
आख़िर में उन्होंने क़ुरआन ख़्वानी का तज़्किरा किया तो मैंने कहा कि ये ग़लत है, क़ुरआन ख़्वानी बिल्कुल न कराएं, ये जो मदरसे के बच्चों को घर पर बुलवा कर क़ुरआन ख़्वानी करवाते हैं, उस के बाद नाश्ता या खाने का जो इंतिज़ाम करते हैं ये बिल्कुल ग़लत है, ऐसा करने से मरहूमा को तो सवाब पहुंचता ही नहीं उल्टा क़ुरआन ख़्वानी करवाने वाले लोग गुनाहगार भी होते हैं।
इसी लिए मैं अपने मदरसे के बच्चों को क़ुरआन ख़्वानी के लिए नहीं भेजता हूँ चाहे कोई ख़ुश रहे या नाख़ुश हो जाए। हाँ मदरसे में ही बग़ैर नाशता और खाने के ईसाले सवाब करवा देता हूँ।
जो काम बिद्अती करते हैं वही काम हम करें तो फ़र्क़ क्या रहा?