पड़ोसियों के साथ हुस्ने सुलूक
🖊️ ज़ैनुल आबिदीन क़ासमी
ख़ादिम जामिया क़ासमिया अशरफ़ुल उलूम नवाबगंज अलियाबाद ज़िला बहराइच
जमीअत उलमाए ज़िला बहराइच की हिदायत पर दिनांक 27/ नवंबर 2023 को नवाबगंज की हज्जिन मस्जिद में बाद नमाज़े इशा इस्लाहे मुआशरा का प्रोग्राम मुनअक़िद हुआ, प्रोग्राम का आग़ाज़ हज्जिन मस्जिद के इमाम हाफ़िज़ अब्दुल बासित साहब की तिलावते क़ुरआने करीम से हुआ, उस के बाद राक़िमुस्सुतूर ज़ैनुल आबिदीन क़ासमी ने पड़ोसियों के हुक़ूक़ से मुतअल्लिक़ तफ़्सीली बयान किया।
क़ुरआन व हदीस की रोशनी में अर्ज़ किया कि पड़ोसियों के साथ अच्छा सुलूक करना और उन को किसी क़िस्म की तक्लीफ़ न पहुंचाना हर मुस्लमान पर ज़रूरी है, और पड़ोसियों की तीन किस्में हैं:(1) एक हक़ वाला पड़ोसी, यह ग़ैर मुस्लिम पड़ोसी है जिसका सिर्फ़ पड़ोसी होने का हक़ है। (2) दो हक़ वाला पड़ोसी, यह मुस्लमान पड़ोसी है जिसका एक हक़ पड़ोसी होने का और एक हक़ मुस्लमान होने का है। (3) तीन हक़ वाला पड़ोसी, यह रिश्तेदार मुस्लमान पड़ोसी है जिसका एक हक़ पड़ोसी होने का, एक हक़ मुस्लमान होने का और एक हक़ रिश्तेदार होने का है। हर क़िस्म के पड़ोसी के साथ अच्छा बर्ताव करने का इस्लाम ने हुक्म दिया है, अगर हर मुस्लमान अपने अपने पड़ोसी का ख़्याल करने लगे और उस को कोई तक्लीफ़ पहुंचाने के बजाए आराम पहुंचाने का एहतिमाम करने लगे तो हमारा मुआशरा एक अच्छा और बेहतरीन मुआशरा बन सकता है। नबीए करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने अपनी उम्मत को जो हिदायात और तालीमात दी हैं अगर आपकी उम्मत उन पर अमल करने लगे तो किसी को किसी से कोई तक्लीफ़ और शिकायत नहीं हो सकती है।
आज हम पड़ोसियों के सिलसिले में बहुत कोताही करते हैं, और पड़ोसियों के हुक़ूक़ को मामूली समझते हैं जब्कि पड़ोसियों के हुक़ूक़ के सिलसिले में नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने बड़ी ताकीद फ़रमाई है, यहाँ तक कि फ़रमाया कि जो शख़्स अल्लाह और क़ियामत के दिन पर ईमान रखता है उस के लिए ज़रूरी है कि अपने पड़ोसी को तक्लीफ़ न पहुंचाए, और एक बार तीन मर्तबा अल्लाह की क़सम खा कर इरशाद फ़रमाया कि अल्लाह की क़सम! वो शख़्स मोमिन नहीं है, अल्लाह की क़सम! वो शख़्स मोमिन नहीं है, अल्लाह की क़सम! वो शख़्स मोमिन नहीं है। नबीए करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की हर बात सच्ची होती है, क्यूंकि आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की ज़ुबाने मुबारक से वही बात निकलती है जो अल्लाह चाहते हैं, इसलिए किसी बात को सच साबित करने के लिए क़सम खाने की ज़रूरत नहीं होती है फिर भी अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम क़सम खा कर कोई बात इरशाद फ़रमाएं तो समझो कि कोई बहुत अहम बात इरशाद फ़रमा रहे हैं जिसमें किसी क़िस्म की कोताही की गुंजाइश नहीं है, तो जब आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने एक बार नहीं तीन तीन बार क़सम खाकर इरशाद फ़रमाया कि वो शख़्स मोमिन नहीं है तो सहाब-ए-किराम रिज़वानुल्लाहि अलैहिम अजमईन ने पूछा: ऐ अल्लाह के रसूल! आप किस के बारे में फ़रमा रहे हैं? तो आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया जिसका पड़ोसी उस की तक्लीफों से महफ़ूज़ न हो यानी जो शख़्स अपने पड़ोसी को तक्लीफ़ पहुँचाता हो उस को सताता हो उस के हुक़ूक़ का ख़्याल न रखता हो वह शख़्स सच्चा और पक्का मोमिन नहीं है, एक बार आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फ़रमाया वह शख़्स जन्नत में दाख़िल नहीं होगा जिसकी तक्लीफों से उस का पड़ोसी महफ़ूज़ न हो। कितनी सख़्त वईद है कि जो शख़्स अपने पड़ोसी को सताता हो वो जन्नत में जाने से महरूम रह जाएगा। इन अहादीस की रोशनी में हम सबको चाहिए कि हमारी किसी हरकत या किसी अमल से हमारे पड़ोसी को कोई तक्लीफ़ न पहुंचने पाए, यहाँ तक कि हम अपने घर के बाहर जनरेटर भी इस तरह न चलाऐं कि हम तो रात-भर आराम से सोते रहें और हमारा पड़ोसी जनरेटर की आवाज़ से परेशान रहे, अपने घर के सामने झाड़ू लगा कर कूड़ा पड़ोसी के घर की तरफ़ न फ़ेंकें, नाली साफ़ करके कचरे का ढेर ऐसी जगह न लगाऐं कि पड़ोसी को आने जाने में दिक़्क़त हो या कचरे की बदबू पड़ोसी के घर तक जाये, अपना मकान बनाते वक़्त भी इस बात का ख़्याल रखें कि आपकी दीवार से पड़ोसी के घर में हवा या रोशनी बंद न हो, अपनी छत पर इतनी ऊंची दीवार ज़रूर उठाएं कि आपकी छत पर कोई जाए तो पड़ोसी का आँगन दिखाई न दे, क्या पता पड़ोसी के घर में कोई किस हाल में बैठा हो और आपकी नज़र पड़ जाये जिससे उस को तक्लीफ़ और नागवारी हो। ग़र्ज़ेकि हर ऐसा काम जिससे पड़ोसी को मामूली तक्लीफ़ फहुंचे या नागवार गुज़रे नहीं करना चाहिए, जो लोग पड़ोसियों को तक्लीफ़ न पहुंचाने का ख़्याल रखते हैं वो मामूली मामूली बातों पर भी बहुत तवज्जोह देते हैं, चुनांचे इमाम ग़ज़ाली रहिमहुल्ला ने अपनी किताब ईहयाउल उलूम में एक वाक़िया लिखा है कि एक शख़्स के घर में चूहे बहुत हो गए थे, तो चूहों से नजात पाने के लिए किसी ने मश्वरा दिया कि अपने घर में बिल्ली पाल लो बस बिल्ली के डर से सारे चूहे भाग जाऐंगे, तो उस शख़्स ने बिल्ली पालने से इसलिए इनकार कर दिया कि बिल्ली के डर से चूहे मेरे घर से तो निकल जाऐंगे लेकिन पड़ोसी के घर में चले जाएंगे और उस को सताएँगे इसलिए मैं यह नहीं चाहता कि मेरे किसी अमल से पड़ोसी को तक्लीफ़ हो। अल्लाहु अकबर!!! कैसे नेक लोग थे, एक हम हैं कि अपने आराम-ओ-राहत के लिए पड़ोसी का बिल्कुल ख़्याल नहीं करते हैं, जब्कि होना यह चाहिए कि पड़ोसी को आराम पहुंचाने के लिए ख़ुद तक्लीफ़ बर्दाश्त करलें, वैसे भी मज़हबे इस्लाम ने हर मौक़े पर अपने से ज़्यादा दूसरे का ख़्याल रखने की तालीम दी है।
पड़ोसियों को किसी भी क़िस्म की तक्लीफ़ नहीं पहुंचानी चाहिए, यहाँ तक कि ज़ुबान से भी पड़ोसी को कोई तक्लीफ़ देह बात नहीं कहनी चाहिए, सख़्त गुनाह है, एक मर्तबा नबीए करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की मज्लिस में एक सहाबी ने अर्ज़ किया कि ऐ अल्लाह के रसूल! एक औरत है जिसके बारे में बड़ा चर्चा है कि वो बहुत नमाज़ पढ़ती है, बहुत रोज़े रखती है, सदक़ा ख़ैरात भी बहुत करती है, मगर उस की आदत यह है कि वो अपनी ज़ुबान से अपने पड़ोसी को सताती है, तो ऐसी औरत के बारे में क्या हुक्म है? नबीए करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने साफ़ लफ़्ज़ों में इरशाद फ़रमाया: यह औरत दोज़ख़ में जाएगी। फिर उन्ही सहाबी ने अर्ज़ किया कि ऐ अल्लाह के रसूल! एक और औरत है जो रोज़े तो कम रखती है, नमाज़ भी कम पढ़ती है, सदक़ा ख़ैरात भी बहुत कम करती है, मगर उस की आदत यह है कि वो अपनी ज़ुबान से अपने पड़ोसी को तक्लीफ़ नहीं देती है तो ऐसी औरत के बारे में क्या हुक्म है? आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने साफ़ लफ़्ज़ों में इरशाद फ़रमाया: यह औरत जन्नत में जाएगी। इस हदीस से मालूम हुआ कि पड़ोसी को ज़ुबान से भी तक्लीफ़ पहुंचाना इतना बड़ा गुनाह है कि नमाज़, रोज़े और सदक़ा ख़ैरात होते हुए भी दोज़ख़ में जाना पड़ेगा। ज़ुबान से तक्लीफ़ देने का मतलब गाली देना, झूटी तोहमत लगाना, बुराई करना, ग़ीबत करना वग़ैरा जिससे पड़ोसी को तक्लीफ़ हो।
पड़ोसियों के साथ अच्छा बर्ताव करना और उनके हुक़ूक़ का अदा करना इतना ज़रूरी है कि नबीए करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम फ़रमाते हैं कि हज़रत जिब्रईल अलैहिस्सलाम हमेशा मुझे पड़ोसियों के साथ हुस्ने सुलूक करने की इतनी ताकीद करते थे कि मुझे यह ख़्याल होने लगा कि कहीं घर के अफ़राद के साथ पड़ोसियों को भी वरासत में हिस्सा देने का हुक्म न दे दें।
पड़ोसियों के हुक़ूक़ की तफ़्सील बयान करते हुए आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फ़रमाया: (1) जब आपका पड़ोसी बीमार हो जाए तो उस की देख रेख करो, यानी बीमार पड़ोसी को जिस चीज़ की ज़रूरत हो और आप वह ज़रूरत पूरी कर सकते हैं तो आप पर ज़रूरी है कि
उस की मदद करें, बीमार पड़ोसी के लिए दवा लाने वाला कोई न हो तो आप दवा लाकर दे दें, उस को डाक्टर के यहाँ या अस्पताल ले जाने की ज़रूरत हो तो आप अपनी गाड़ी से या गाड़ी का इंतिज़ाम करके उस को पहुंचाने में मदद करें, दवा इलाज के लिए उस के पास पैसे न हों तो आप उस के लिए पैसों का इंतिज़ाम करें, आप ख़ुद डाक्टर हों तो बीमार पड़ोसी की हैसियत के मुताबिक़ उस का मुफ़्त इलाज करें या कम पैसों में इलाज करें। (2) अगर पड़ोसी का इंतिक़ाल हो जाए तो उस के जनाज़े में शरीक हों। (3) अगर पड़ोसी किसी ज़रूरत के लिए आप से क़र्ज़ मांगे तो उस को क़र्ज़ दें। और ये क़र्ज़ बग़ैर सूद के दें, जितना दें उस से ज़्यादा हरगिज़ न लें, हाँ उस की हैसियत के मुताबिक़ पूरा क़र्ज़ माफ़ कर दें या कुछ क़र्ज़ माफ़ कर दें, यानी अगर पड़ोसी ग़रीब हो क़र्ज़ अदा करने की ताक़त न रखता हो तो पूरा क़र्ज़ माफ़ कर दें या वो जितना अदा कर सकता हो उतना ले लें बाक़ी माफ़ कर दें। (4) अगर पड़ोसी किसी मुसीबत में गिरफ़्तार हो जाए तो उस की ख़बर-गीरी करो, यानी उस की मुसीबत दूर करने की पूरी कोशिश करो, जैसे आपके पड़ोसी पर कोई ज़ुल्म कर रहा है, उस को नाहक़ सता रहा है, तो आप उस को ज़ालिम के ज़ुल्म से बचाने में मदद करो, किसी ने आपके पड़ोसी पर नाहक़ मुक़द्दमा कर दिया तो आपसे जो हो सके उस की मदद करो, आपका पड़ोसी किसी का क़र्ज़दार है और क़र्ज़ की अदायगी के लिए उस के पास इंतिज़ाम नहीं है, और क़र्ज़ख़्वाह परेशान कर रहा है तो आप उस की क़र्ज़ की अदायगी में मदद करें, आप के पड़ोसी के घर में किसी का इन्तिक़ाल हो जाए तो उस के घर आए हुए मेहमानों और उस के बच्चों के लिए खाने पीने का इन्तिज़ाम करें, ग़र्ज़ेकि आपका पड़ोसी जिस क़िस्म की मुसीबत में गिरफ़्तार हो तो आप हर मुम्किन उस का तआवुन करें। (5) आपके पड़ोसी से कोई ग़लती हो जाए तो पर्दापोशी करो, यानी आपका पड़ोसी कोई ग़लत काम कर बैठे तो पूरे मुहल्ले और मुआशरे में उस को बदनाम न करो, लोगों से बताते न फिरो बल्कि उस पर पर्दा डाल दो और यह समझो कि कुछ हुवा ही नहीं है। अफ़्सोस सोता उस है कि आज किसी को बदनाम करने वाला पहला शख़्स उस का पड़ोसी ही होता है। (6) आपके घर में सालन बने तो इस तरह बनाओ कि सालन की ख़ुशबू पड़ोसी के घर तक न पहुंचे, और अगर सालन की ख़ुशबू पड़ोसी के घर पहुंच रही हो तो उस के घर सालन ज़रूर भेजो ताकि उस के बच्चों को आपके सालन की ख़ुशबू से तक्लीफ़ न हो।
पड़ोसियों के दर्मियान मुहब्बत और तअल्लुक़ क़ायम रखने के लिए नबीए करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने एक दूसरे को हदया व तोहफ़ा देने का हुक्म देते हुए फ़रमाया कि अगर आपके घर में सालन बन रहा हो तो शोरबा ज़्यादा कर दो और थोड़ा सा सालन पड़ोसी के घर भी भेज दो, और यह सालन सिर्फ़ एक मिसाल है, मतलब यह है कि आपके घर में जब भी कोई अच्छी चीज़ बने तो थोड़ा सा पड़ोसी के घर भी भेज दो, एक हदीस से मालूम होता है कि पड़ोसी के घर भेजने के लिए कोई क़ीमती चीज होना ही जरूरी नहीं है बल्कि मामूली चीज भी भेजी जा सकती है लिहाज़ा अगर कोई औरत अपनी पड़ोसन औरत के घर कोई मामूली चीज़ भेजे तो उसको हक़ीर न समझे बल्कि खुशदिली से उसको क़बूल कर ले, इस तरह एक दूसरे के घर चीज़ें भेजने से आपस में मुहब्बत बढ़ती है, तअल्लुक़ात मज़्बूत होते हैं, एक दूसरे के दिल में हमदर्दी पैदा होती है।
पड़ोसी के दुख-दर्द का ख़्याल न रखने वाले के बारे में आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फ़रमाया कि वह शख़्स मोमिन नहीं है जो ख़ुद तो पेट भर खाए और उस का पड़ोसी भूका रहे। यहाँ भी खाना और भूक सिर्फ एक मिसाल है, मतलब यह है कि आपके पास ज़रूरियाते ज़िंदगी की ऐसी चीज़ें हैं जिनसे आपका पड़ोसी महरूम है तो अपने में से कुछ पड़ोसी के लिए भी इंतिज़ाम कर दें, मसलन: पड़ोसी के पास खाने का इंतिज़ाम नहीं है तो आप उस के घर खाना भेज दें, पहेनने के लिए कपड़ों का मोहताज है तो आप उस के लिए कपड़ों का इंतिज़ाम कर दें, जाड़े के मौसम में गर्म कपड़ों या लिहाफ़ और चादर वग़ैरा की उस को ज़रूरत हो तो आप उस का इंतिज़ाम कर दें, ऐसा ना हो कि आप गर्म गर्म बिस्तरों में रात-भर आराम से सोते रहें और आपका पड़ोसी रात-भर जाड़े में ठिठुरता रहे और सो भी न पाए, इसी तरह आपके घर में गर्म पानी का इंतिज़ाम हो तो पड़ोसी के घर में थोड़ा गर्म पानी भेज दिया करें ताकि उस के बच्चे भी ठंडक में गर्म पानी से नहा सकें, ऐसे ही गर्मी के मौसम में आपके घर फ़्रीज है तो दो एक बोतल ठंडा पानी पड़ोसी के घर भी भेज दें ताकि वह भी ठंडा पानी पी सके। ग़र्ज़ेकि पड़ोसी का हर तरह से ख़्याल रखना चाहिए।
पड़ोसी के साथ अच्छा सुलूक करना और उस को तक्लीफ़ न पहुंचाना यह इतना अहम है कि नबीए करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इन्सान के अच्छा और बुरा होने का मदार इसी को बना दिया। चुनांचे एक-बार एक शख़्स ने नबीए करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से पूछा कि ऐ अल्लाह के रसूल! मुझे कैसे मालूम हो कि मैं अच्छा हूँ या बुरा हूँ? तो आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया कि जब तुम सुनो कि तुम्हारा पड़ोसी तुम्हारी तारीफ़ कर रहा है और कह रहा है कि तुम अच्छे हो तो वाक़ई तुम अच्छे हो, और जब तुम सुनो कि तुम्हारा पड़ोसी तुम्हारे बारे में कह रहा है कि तुम बुरे हो तो वाक़ई तुम बुरे हो। ज़ाहिर सी बात है कि जब हम अपने पड़ोसी के साथ अच्छा बर्ताव करेंगे तो वो हमारी तारीफ़ ही करेगा, और जब उस के साथ बुरा सुलूक करेंगे तो वो हम को बुरा ही कहेगा।
एक-बार अमीरुल मोमिनीन हज़रत उमर रज़ियल्लाहु अन्हु की ख़िदमत में एक मुक़द्दमा आया, इस मुक़द्दमे के दो गवाह पेश किए गए, एक गवाह के बारे हज़रत उमर रज़ियल्लाहु अन्हु जानते थे कि इस की गवाही काबिले क़बूल है, मगर दूसरे गवाह के बारे में मालूम नहीं था कि वह कैसा है? तो हाज़िरीन से पूछा कि कोई शख़्स इस के अच्छा या बुरा होने को जानता है? तो एक शख़्स ने खड़े हो कर कहा कि हाँ मैं जानता हूँ यह शख़्स अच्छा है। तो अमीरुल मोमिनीन ने पूछा कि तुमको कैसे मालूम कि ये अच्छा शख़्स है क्या तुम उस के पड़ोसी हो? या तुमने कभी उस के साथ सफ़र किया है? उस शख़्स ने कहा कि जी नहीं न मैं इस का पड़ोसी हूँ न मैंने इस के साथ सफ़र किया है। तो अमीरुल मोमिनीन ने फ़रमाया कि लगता है तुमने इस आदमी को मस्जिद से निकलते हुए देखा है और इसी लिए फ़ैसला कर दिया कि यह अच्छा आदमी है? अमीरुल मोमिनीन हज़रत उमर रज़ियल्लाहु अन्हु के फ़रमान का मतलब यह था कि कोई शख़्स सिर्फ़ मस्जिद से नमाज़ पढ़ कर निकलने से अच्छा आदमी नहीं हो जाता है बल्कि ज़रूरी है कि वो अपने पड़ोसी के साथ अच्छा सुलूक करे और उस के पड़ोसी उस के अच्छा होने की गवाही दें। वर्ना नमाज़, रोज़ा, ज़कात और हज वग़ैरा इबादात का एहतिमाम करने के बावजूद हम अच्छे नहीं रहेंगे।
एक-बार नबीए करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फ़रमाया कि अल्लाह के नज़्दीक बेहतरीन पड़ोसी वह है जो अपने पड़ोसी के साथ अच्छा सुलूक करता हो। इन तमाम अहादीस से नबीए करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम अपनी उम्मत को यही सिखा रहे हैं कि हर मोमिन अपने पड़ोसी के साथ अच्छा सुलूक करे और उस को किसी क़िस्म की तक्लीफ़ न पहुंचने दे।
वाज़ेह रहे कि एक पड़ोसी तो वह है जो मुस्तक़िल पड़ोसी है यानी जो आपके घर का पड़ोसी है और एक पड़ोसी वह भी है जो कुछ देर के लिए आपका पड़ोसी बना है, जैसे आप बस, ट्रेन या हवाई जहाज़ में सफ़र कर रहे हों और आपके बग़ल में कोई बैठा हो या आप मस्जिद, या किसी दीनी-ओ-दुनियावी मज्लिस या जलसों में हों और आपके बग़ल में कोई बैठा हो वो भी थोड़ी देर ही के लिए सही लेकिन आपका पड़ोसी है उस के साथ भी अच्छा सुलूक करने का क़ुरआने करीम ने हुक्म दिया है, लिहाज़ा ऐसे पड़ोसी को भी आराम पहुंचाने का ख़्याल रखना चाहिए और हर ऐसे काम से बचना चाहिए जिससे इस बग़ल वाले पड़ोसी को तक्लीफ़ पहुंचे, जैसे बीड़ी या सिगरेट के धोएं से इसी तरह आपके गुटखा वग़ैरा खाने से उस को तक्लीफ़ हो रही हो तो हरगिज़ ऐसी चीज़ों का इस्तिमाल न करें।
आख़िर में दरख़्वास्त की कि जो बातें अर्ज़ की गई हैं उन पर हम लोग ज़रूर अमल करें, अगर हम सब लोग अपने अपने पड़ोसी का ख़्याल करने लगें तो न हमसे किसी को तक्लीफ़ पहुंचे और न हमको किसी से तक्लीफ़ पहुंचे, इस तरह हमारा मुआशरा एक बेहतरीन और ख़ुश्गवार मुआशरा बन सकता है।
फिर दुआ पर प्रोग्राम का इख़्तिताम हुआ।
इस प्रोग्राम में काफ़ी लोग मौजूद थे, क़स्बा के मुअज़्ज़ज़ लोगों के साथ साथ नौजवानों की एक बड़ी तादाद मौजूद थी।