Tuesday, November 28, 2023

पड़ोसियों के साथ हुस्ने सुलूक

पड़ोसियों के साथ हुस्ने सुलूक

🖊️ ज़ैनुल आबिदीन क़ासमी
ख़ादिम जामिया क़ासमिया अशरफ़ुल उलूम नवाबगंज अलियाबाद ज़िला बहराइच

जमीअत उलमाए ज़िला बहराइच की हिदायत पर दिनांक 27/ नवंबर 2023 को नवाबगंज की हज्जिन मस्जिद में बाद नमाज़े इशा इस्लाहे मुआशरा का प्रोग्राम मुनअक़िद हुआ, प्रोग्राम का आग़ाज़ हज्जिन मस्जिद के इमाम हाफ़िज़ अब्दुल बासित साहब की तिलावते क़ुरआने करीम से हुआ, उस के बाद राक़िमुस्सुतूर ज़ैनुल आबिदीन क़ासमी ने पड़ोसियों के हुक़ूक़ से मुतअल्लिक़ तफ़्सीली बयान किया।

क़ुरआन व हदीस की रोशनी में अर्ज़ किया कि पड़ोसियों के साथ अच्छा सुलूक करना और उन को किसी क़िस्म की तक्लीफ़ न पहुंचाना हर मुस्लमान पर ज़रूरी है, और पड़ोसियों की तीन किस्में हैं:(1) एक हक़ वाला पड़ोसी, यह ग़ैर मुस्लिम पड़ोसी है जिसका सिर्फ़ पड़ोसी होने का हक़ है। (2) दो हक़ वाला पड़ोसी, यह मुस्लमान पड़ोसी है जिसका एक हक़ पड़ोसी होने का और एक हक़ मुस्लमान होने का है। (3) तीन हक़ वाला पड़ोसी, यह रिश्तेदार मुस्लमान पड़ोसी है जिसका एक हक़ पड़ोसी होने का, एक हक़ मुस्लमान होने का और एक हक़ रिश्तेदार होने का है। हर क़िस्म के पड़ोसी के साथ अच्छा बर्ताव करने का इस्लाम ने हुक्म दिया है, अगर हर मुस्लमान अपने अपने पड़ोसी का ख़्याल करने लगे और उस को कोई तक्लीफ़ पहुंचाने के बजाए आराम पहुंचाने का एहतिमाम करने लगे तो हमारा मुआशरा एक अच्छा और बेहतरीन मुआशरा बन सकता है। नबीए करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने अपनी उम्मत को जो हिदायात और तालीमात दी हैं अगर आपकी उम्मत उन पर अमल करने लगे तो किसी को किसी से कोई तक्लीफ़ और शिकायत नहीं हो सकती है।

आज हम पड़ोसियों के सिलसिले में बहुत कोताही करते हैं, और पड़ोसियों के हुक़ूक़ को मामूली समझते हैं जब्कि पड़ोसियों के हुक़ूक़ के सिलसिले में नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने बड़ी ताकीद फ़रमाई है, यहाँ तक कि फ़रमाया कि जो शख़्स अल्लाह और क़ियामत के दिन पर ईमान रखता है उस के लिए ज़रूरी है कि अपने पड़ोसी को तक्लीफ़ न पहुंचाए, और एक बार तीन मर्तबा अल्लाह की क़सम खा कर इरशाद फ़रमाया कि अल्लाह की क़सम! वो शख़्स मोमिन नहीं है, अल्लाह की क़सम! वो शख़्स मोमिन नहीं है, अल्लाह की क़सम! वो शख़्स मोमिन नहीं है। नबीए करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की हर बात सच्ची होती है, क्यूंकि आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की ज़ुबाने मुबारक से वही बात निकलती है जो अल्लाह चाहते हैं, इसलिए किसी बात को सच साबित करने के लिए क़सम खाने की ज़रूरत नहीं होती है फिर भी अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम क़सम खा कर कोई बात इरशाद फ़रमाएं तो समझो कि कोई बहुत अहम बात इरशाद फ़रमा रहे हैं जिसमें किसी क़िस्म की कोताही की गुंजाइश नहीं है, तो जब आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने एक बार नहीं तीन तीन बार क़सम खाकर इरशाद फ़रमाया कि वो शख़्स मोमिन नहीं है तो सहाब-ए-किराम रिज़वानुल्लाहि अलैहिम अजमईन ने पूछा: ऐ अल्लाह के रसूल! आप किस के बारे में फ़रमा रहे हैं? तो आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया जिसका पड़ोसी उस की तक्लीफों से महफ़ूज़ न हो यानी जो शख़्स अपने पड़ोसी को तक्लीफ़ पहुँचाता हो उस को सताता हो उस के हुक़ूक़ का ख़्याल न रखता हो वह शख़्स सच्चा और पक्का मोमिन नहीं है, एक बार आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फ़रमाया वह शख़्स जन्नत में दाख़िल नहीं होगा जिसकी तक्लीफों से उस का पड़ोसी महफ़ूज़ न हो। कितनी सख़्त वईद है कि जो शख़्स अपने पड़ोसी को सताता हो वो जन्नत में जाने से महरूम रह जाएगा। इन अहादीस की रोशनी में हम सबको चाहिए कि हमारी किसी हरकत या किसी अमल से हमारे पड़ोसी को कोई तक्लीफ़ न पहुंचने पाए, यहाँ तक कि हम अपने घर के बाहर जनरेटर भी इस तरह न चलाऐं कि हम तो रात-भर आराम से सोते रहें और हमारा पड़ोसी जनरेटर की आवाज़ से परेशान रहे, अपने घर के सामने झाड़ू लगा कर कूड़ा पड़ोसी के घर की तरफ़ न फ़ेंकें, नाली साफ़ करके कचरे का ढेर ऐसी जगह न लगाऐं कि पड़ोसी को आने जाने में दिक़्क़त हो या कचरे की बदबू पड़ोसी के घर तक जाये, अपना मकान बनाते वक़्त भी इस बात का ख़्याल रखें कि आपकी दीवार से पड़ोसी के घर में हवा या रोशनी बंद न हो, अपनी छत पर इतनी ऊंची दीवार ज़रूर उठाएं कि आपकी छत पर कोई जाए तो पड़ोसी का आँगन दिखाई न दे, क्या पता पड़ोसी के घर में कोई किस हाल में बैठा हो और आपकी नज़र पड़ जाये जिससे उस को तक्लीफ़ और नागवारी हो। ग़र्ज़ेकि हर ऐसा काम जिससे पड़ोसी को मामूली तक्लीफ़ फहुंचे या नागवार गुज़रे नहीं करना चाहिए, जो लोग पड़ोसियों को तक्लीफ़ न पहुंचाने का ख़्याल रखते हैं वो मामूली मामूली बातों पर भी बहुत तवज्जोह देते हैं, चुनांचे इमाम ग़ज़ाली रहिमहुल्ला ने अपनी किताब ईहयाउल उलूम में एक वाक़िया लिखा है कि एक शख़्स के घर में चूहे बहुत हो गए थे, तो चूहों से नजात पाने के लिए किसी ने मश्वरा दिया कि अपने घर में बिल्ली पाल लो बस बिल्ली के डर से सारे चूहे भाग जाऐंगे, तो उस शख़्स ने बिल्ली पालने से इसलिए इनकार कर दिया कि बिल्ली के डर से चूहे मेरे घर से तो निकल जाऐंगे लेकिन पड़ोसी के घर में चले जाएंगे और उस को सताएँगे इसलिए मैं यह नहीं चाहता कि मेरे किसी अमल से पड़ोसी को तक्लीफ़ हो। अल्लाहु अकबर!!! कैसे नेक लोग थे, एक हम हैं कि अपने आराम-ओ-राहत के लिए पड़ोसी का बिल्कुल ख़्याल नहीं करते हैं, जब्कि होना यह चाहिए कि पड़ोसी को आराम पहुंचाने के लिए ख़ुद तक्लीफ़ बर्दाश्त करलें, वैसे भी मज़हबे इस्लाम ने हर मौक़े पर अपने से ज़्यादा दूसरे का ख़्याल रखने की तालीम दी है।

पड़ोसियों को किसी भी क़िस्म की तक्लीफ़ नहीं पहुंचानी चाहिए, यहाँ तक कि ज़ुबान से भी पड़ोसी को कोई तक्लीफ़ देह बात नहीं कहनी चाहिए, सख़्त गुनाह है, एक मर्तबा नबीए करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की मज्लिस में एक सहाबी ने अर्ज़ किया कि ऐ अल्लाह के रसूल! एक औरत है जिसके बारे में बड़ा चर्चा है कि वो बहुत नमाज़ पढ़ती है, बहुत रोज़े रखती है, सदक़ा ख़ैरात भी बहुत करती है, मगर उस की आदत यह है कि वो अपनी ज़ुबान से अपने पड़ोसी को सताती है, तो ऐसी औरत के बारे में क्या हुक्म है? नबीए करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने साफ़ लफ़्ज़ों में इरशाद फ़रमाया: यह औरत दोज़ख़ में जाएगी। फिर उन्ही सहाबी ने अर्ज़ किया कि ऐ अल्लाह के रसूल! एक और औरत है जो रोज़े तो कम रखती है, नमाज़ भी कम पढ़ती है, सदक़ा ख़ैरात भी बहुत कम करती है, मगर उस की आदत यह है कि वो अपनी ज़ुबान से अपने पड़ोसी को तक्लीफ़ नहीं देती है तो ऐसी औरत के बारे में क्या हुक्म है? आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने साफ़ लफ़्ज़ों में इरशाद फ़रमाया: यह औरत जन्नत में जाएगी। इस हदीस से मालूम हुआ कि पड़ोसी को ज़ुबान से भी तक्लीफ़ पहुंचाना इतना बड़ा गुनाह है कि नमाज़, रोज़े और सदक़ा ख़ैरात होते हुए भी दोज़ख़ में जाना पड़ेगा। ज़ुबान से तक्लीफ़ देने का मतलब गाली देना, झूटी तोहमत लगाना, बुराई करना, ग़ीबत करना वग़ैरा जिससे पड़ोसी को तक्लीफ़ हो।

पड़ोसियों के साथ अच्छा बर्ताव करना और उनके हुक़ूक़ का अदा करना इतना ज़रूरी है कि नबीए करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम फ़रमाते हैं कि हज़रत जिब्रईल अलैहिस्सलाम हमेशा मुझे पड़ोसियों के साथ हुस्ने सुलूक करने की इतनी ताकीद करते थे कि मुझे यह ख़्याल होने लगा कि कहीं घर के अफ़राद के साथ पड़ोसियों को भी वरासत में हिस्सा देने का हुक्म न दे दें।

पड़ोसियों के हुक़ूक़ की तफ़्सील बयान करते हुए आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फ़रमाया: (1) जब आपका पड़ोसी बीमार हो जाए तो उस की देख रेख करो, यानी बीमार पड़ोसी को जिस चीज़ की ज़रूरत हो और आप वह ज़रूरत पूरी कर सकते हैं तो आप पर ज़रूरी है कि
उस की मदद करें, बीमार पड़ोसी के लिए दवा लाने वाला कोई न हो तो आप दवा लाकर दे दें, उस को डाक्टर के यहाँ या अस्पताल ले जाने की ज़रूरत हो तो आप अपनी गाड़ी से या गाड़ी का इंतिज़ाम करके उस को पहुंचाने में मदद करें, दवा इलाज के लिए उस के पास पैसे न हों तो आप उस के लिए पैसों का इंतिज़ाम करें, आप ख़ुद डाक्टर हों तो बीमार पड़ोसी की हैसियत के मुताबिक़ उस का मुफ़्त इलाज करें या कम पैसों में इलाज करें। (2) अगर पड़ोसी का इंतिक़ाल हो जाए तो उस के जनाज़े में शरीक हों। (3) अगर पड़ोसी किसी ज़रूरत के लिए आप से क़र्ज़ मांगे तो उस को क़र्ज़ दें। और ये क़र्ज़ बग़ैर सूद के दें, जितना दें उस से ज़्यादा हरगिज़ न लें, हाँ उस की हैसियत के मुताबिक़ पूरा क़र्ज़ माफ़ कर दें या कुछ क़र्ज़ माफ़ कर दें, यानी अगर पड़ोसी ग़रीब हो क़र्ज़ अदा करने की ताक़त न रखता हो तो पूरा क़र्ज़ माफ़ कर दें या वो जितना अदा कर सकता हो उतना ले लें बाक़ी माफ़ कर दें। (4) अगर पड़ोसी किसी मुसीबत में गिरफ़्तार हो जाए तो उस की ख़बर-गीरी करो, यानी उस की मुसीबत दूर करने की पूरी कोशिश करो, जैसे आपके पड़ोसी पर कोई ज़ुल्म कर रहा है, उस को नाहक़ सता रहा है, तो आप उस को ज़ालिम के ज़ुल्म से बचाने में मदद करो, किसी ने आपके पड़ोसी पर नाहक़ मुक़द्दमा कर दिया तो आपसे जो हो सके उस की मदद करो, आपका पड़ोसी किसी का क़र्ज़दार है और क़र्ज़ की अदायगी के लिए उस के पास इंतिज़ाम नहीं है, और क़र्ज़ख़्वाह परेशान कर रहा है तो आप उस की क़र्ज़ की अदायगी में मदद करें, आप के पड़ोसी के घर में किसी का इन्तिक़ाल हो जाए तो उस के घर आए हुए मेहमानों और उस के बच्चों के लिए खाने पीने का इन्तिज़ाम करें, ग़र्ज़ेकि आपका पड़ोसी जिस क़िस्म की मुसीबत में गिरफ़्तार हो तो आप हर मुम्किन उस का तआवुन करें। (5) आपके पड़ोसी से कोई ग़लती हो जाए तो पर्दापोशी करो, यानी आपका पड़ोसी कोई ग़लत काम कर बैठे तो पूरे मुहल्ले और मुआशरे में उस को बदनाम न करो, लोगों से बताते न फिरो बल्कि उस पर पर्दा डाल दो और यह समझो कि कुछ हुवा ही नहीं है। अफ़्सोस सोता उस है कि आज किसी को बदनाम करने वाला पहला शख़्स उस का पड़ोसी ही होता है। (6) आपके घर में सालन बने तो इस तरह बनाओ कि सालन की ख़ुशबू पड़ोसी के घर तक न पहुंचे, और अगर सालन की ख़ुशबू पड़ोसी के घर पहुंच रही हो तो उस के घर सालन ज़रूर भेजो ताकि उस के बच्चों को आपके सालन की ख़ुशबू से तक्लीफ़ न हो।

पड़ोसियों के दर्मियान मुहब्बत और तअल्लुक़ क़ायम रखने के लिए नबीए करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने एक दूसरे को हदया व तोहफ़ा देने का हुक्म देते हुए फ़रमाया कि अगर आपके घर में सालन बन रहा हो तो शोरबा ज़्यादा कर दो और थोड़ा सा सालन पड़ोसी के घर भी भेज दो, और यह सालन सिर्फ़ एक मिसाल है, मतलब यह है कि आपके घर में जब भी कोई अच्छी चीज़ बने तो थोड़ा सा पड़ोसी के घर भी भेज दो, एक हदीस से मालूम होता है कि पड़ोसी के घर भेजने के लिए कोई क़ीमती चीज होना ही जरूरी नहीं है बल्कि मामूली चीज भी भेजी जा सकती है लिहाज़ा अगर कोई औरत अपनी पड़ोसन औरत के घर कोई मामूली चीज़ भेजे तो उसको हक़ीर न समझे बल्कि खुशदिली से उसको क़बूल कर ले, इस तरह एक दूसरे के घर चीज़ें भेजने से आपस में मुहब्बत बढ़ती है, तअल्लुक़ात मज़्बूत होते हैं, एक दूसरे के दिल में हमदर्दी पैदा होती है।

पड़ोसी के दुख-दर्द का ख़्याल न रखने वाले के बारे में आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फ़रमाया कि वह शख़्स मोमिन नहीं है जो ख़ुद तो पेट भर खाए और उस का पड़ोसी भूका रहे। यहाँ भी खाना और भूक सिर्फ एक मिसाल है, मतलब यह है कि आपके पास ज़रूरियाते ज़िंदगी की ऐसी चीज़ें हैं जिनसे आपका पड़ोसी महरूम है तो अपने में से कुछ पड़ोसी के लिए भी इंतिज़ाम कर दें, मसलन: पड़ोसी के पास खाने का इंतिज़ाम नहीं है तो आप उस के घर खाना भेज दें, पहेनने के लिए कपड़ों का मोहताज है तो आप उस के लिए कपड़ों का इंतिज़ाम कर दें, जाड़े के मौसम में गर्म कपड़ों या लिहाफ़ और चादर वग़ैरा की उस को ज़रूरत हो तो आप उस का इंतिज़ाम कर दें, ऐसा ना हो कि आप गर्म गर्म बिस्तरों में रात-भर आराम से सोते रहें और आपका पड़ोसी रात-भर जाड़े में ठिठुरता रहे और सो भी न पाए, इसी तरह आपके घर में गर्म पानी का इंतिज़ाम हो तो पड़ोसी के घर में थोड़ा गर्म पानी भेज दिया करें ताकि उस के बच्चे भी ठंडक में गर्म पानी से नहा सकें, ऐसे ही गर्मी के मौसम में आपके घर फ़्रीज है तो दो एक बोतल ठंडा पानी पड़ोसी के घर भी भेज दें ताकि वह भी ठंडा पानी पी सके। ग़र्ज़ेकि पड़ोसी का हर तरह से ख़्याल रखना चाहिए।

पड़ोसी के साथ अच्छा सुलूक करना और उस को तक्लीफ़ न पहुंचाना यह इतना अहम है कि नबीए करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इन्सान के अच्छा और बुरा होने का मदार इसी को बना दिया‌। चुनांचे एक-बार एक शख़्स ने नबीए करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से पूछा कि ऐ अल्लाह के रसूल! मुझे कैसे मालूम हो कि मैं अच्छा हूँ या बुरा हूँ? तो आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया कि जब तुम सुनो कि तुम्हारा पड़ोसी तुम्हारी तारीफ़ कर रहा है और कह रहा है कि तुम अच्छे हो तो वाक़ई तुम अच्छे हो, और जब तुम सुनो कि तुम्हारा पड़ोसी तुम्हारे बारे में कह रहा है कि तुम बुरे हो तो वाक़ई तुम बुरे हो। ज़ाहिर सी बात है कि जब हम अपने पड़ोसी के साथ अच्छा बर्ताव करेंगे तो वो हमारी तारीफ़ ही करेगा, और जब उस के साथ बुरा सुलूक करेंगे तो वो हम को बुरा ही कहेगा।

एक-बार अमीरुल मोमिनीन हज़रत उमर रज़ियल्लाहु अन्हु की ख़िदमत में एक मुक़द्दमा आया, इस मुक़द्दमे के दो गवाह पेश किए गए, एक गवाह के बारे हज़रत उमर रज़ियल्लाहु अन्हु जानते थे कि इस की गवाही काबिले क़बूल है, मगर दूसरे गवाह के बारे में मालूम नहीं था कि वह कैसा है? तो हाज़िरीन से पूछा कि कोई शख़्स इस के अच्छा या बुरा होने को जानता है? तो एक शख़्स ने खड़े हो कर कहा कि हाँ मैं जानता हूँ यह शख़्स अच्छा है। तो अमीरुल मोमिनीन ने पूछा कि तुमको कैसे मालूम कि ये अच्छा शख़्स है क्या तुम उस के पड़ोसी हो? या तुमने कभी उस के साथ सफ़र किया है? उस शख़्स ने कहा कि जी नहीं न मैं इस का पड़ोसी हूँ न मैंने इस के साथ सफ़र किया है। तो अमीरुल मोमिनीन ने फ़रमाया कि लगता है तुमने इस आदमी को मस्जिद से निकलते हुए देखा है और इसी लिए फ़ैसला कर दिया कि यह अच्छा आदमी है? अमीरुल मोमिनीन हज़रत उमर रज़ियल्लाहु अन्हु के फ़रमान का मतलब यह था कि कोई शख़्स सिर्फ़ मस्जिद से नमाज़ पढ़ कर निकलने से अच्छा आदमी नहीं हो जाता है बल्कि ज़रूरी है कि वो अपने पड़ोसी के साथ अच्छा सुलूक करे और उस के पड़ोसी उस के अच्छा होने की गवाही दें। वर्ना नमाज़, रोज़ा, ज़कात और हज वग़ैरा इबादात का एहतिमाम करने के बावजूद हम अच्छे नहीं रहेंगे।
एक-बार नबीए करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फ़रमाया कि अल्लाह के नज़्दीक बेहतरीन पड़ोसी वह है जो अपने पड़ोसी के साथ अच्छा सुलूक करता हो। इन तमाम अहादीस से नबीए करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम अपनी उम्मत को यही सिखा रहे हैं कि हर मोमिन अपने पड़ोसी के साथ अच्छा सुलूक करे और उस को किसी क़िस्म की तक्लीफ़ न पहुंचने दे।

वाज़ेह रहे कि एक पड़ोसी तो वह है जो मुस्तक़िल पड़ोसी है यानी जो आपके घर का पड़ोसी है और एक पड़ोसी वह भी है जो कुछ देर के लिए आपका पड़ोसी बना है, जैसे आप बस, ट्रेन या हवाई जहाज़ में सफ़र कर रहे हों और आपके बग़ल में कोई बैठा हो या आप मस्जिद, या किसी दीनी-ओ-दुनियावी मज्लिस या जलसों में हों और आपके बग़ल में कोई बैठा हो वो भी थोड़ी देर ही के लिए सही लेकिन आपका पड़ोसी है उस के साथ भी अच्छा सुलूक करने का क़ुरआने करीम ने हुक्म दिया है, लिहाज़ा ऐसे पड़ोसी को भी आराम पहुंचाने का ख़्याल रखना चाहिए और हर ऐसे काम से बचना चाहिए जिससे इस बग़ल वाले पड़ोसी को तक्लीफ़ पहुंचे, जैसे बीड़ी या सिगरेट के धोएं से इसी तरह आपके गुटखा वग़ैरा खाने से उस को तक्लीफ़ हो रही हो तो हरगिज़ ऐसी चीज़ों का इस्तिमाल न करें।

आख़िर में दरख़्वास्त की कि जो बातें अर्ज़ की गई हैं उन पर हम लोग ज़रूर अमल करें, अगर हम सब लोग अपने अपने पड़ोसी का ख़्याल करने लगें तो न हमसे किसी को तक्लीफ़ पहुंचे और न हमको किसी से तक्लीफ़ पहुंचे, इस तरह हमारा मुआशरा एक बेहतरीन और ख़ुश्गवार मुआशरा बन सकता है।

फिर दुआ पर प्रोग्राम का इख़्तिताम हुआ।

इस प्रोग्राम में काफ़ी लोग मौजूद थे, क़स्बा के मुअज़्ज़ज़ लोगों के साथ साथ नौजवानों की एक बड़ी तादाद मौजूद थी।

پڑوسیوں کے ساتھ حُسنِ سلوک

پڑوسیوں کے ساتھ حُسنِ سلوک

🖊️ زین العابدین قاسمی
خادم جامعہ قاسمیہ اشرف العلوم نواب گنج علی آباد ضلع بہرائچ

جمعیۃ علمائے ضلع بہرائچ کی ہدایت پر مؤرخہ ۲۷/ فروری ۲۰۲۳؁ء کو نواب گنج علی آباد کی حجن مسجد میں بعد نمازِ عشاء اصلاح معاشرہ کا پروگرام منعقد ہوا، پروگرام کا آغاز حجن مسجد کے امام حافظ عبدالباسط صاحب کی تلاوتِ قرآن کریم سے ہوا، اس کے بعد راقم السُّطور زین العابدین قاسمی نے پڑوسیوں کے حقوق سے متعلق تفصیلی بیان کیا۔

قرآن و حدیث کی روشنی میں عرض کیا کہ پڑوسیوں کے ساتھ اچھا سلوک کرنا اور اُن کو کسی قسم کی تکلیف نہ پہنچانا ہر مسلمان پر ضروری ہے، اور پڑوسیوں کی تین قسمیں ہیں: (۱) ایک حق والا پڑوسی، یہ غیرمسلم پڑوسی ہے جس کا صرف پڑوسی ہونے کا حق ہے (۲) دو حق والا پڑوسی، یہ مسلمان پڑوسی ہے جس کا ایک حق پڑوسی ہونے کا اور ایک حق مسلمان ہونے کا ہے (۳) تین حق والا پڑوسی، یہ رشتے دار مسلمان پڑوسی ہے جس کا ایک حق پڑوسی ہونے کا، ایک حق مسلمان ہونے کا اور ایک حق رشتے دار ہونے کا ہے۔ ہر قسم کے پڑوسی کے ساتھ اچھا برتاؤ کرنے کا اسلام نے حکم دیا ہے، اگر ہر مسلمان اپنے اپنے پڑوسی کا خیال کرنے لگے اور اس کو کوئی تکلیف پہنچانے کے بجائے آرام پہنچانے کا اہتمام کرنے لگے تو ہمارا معاشرہ ایک اچھا اور بہترین معاشرہ بن سکتا ہے۔ نبی کریم ﷺ نے اپنی امت کو جو ہدایات اور تعلیمات دی ہیں اگر آپ کی امت اُن پر عمل کرنے لگے تو کسی کو کسی سے کوئی تکلیف اور شکایت نہیں ہوسکتی ہے۔

آج ہم پڑوسیوں کے سلسلے میں بہت کوتاہی کرتے ہیں، اور پڑوسیوں کے حقوق کو معمولی سمجھتے ہیں جب کہ پڑوسیوں کے حقوق کے سلسلے میں نبی کریم ﷺ نے بڑی تاکید فرمائی ہے، یہاں تک کہ فرمایا کہ جو شخص اللہ اور قیامت کے دن پر ایمان رکھتا ہے اس کے لیے ضروری ہے کہ اپنے پڑوسی کو تکلیف نہ پہنچائے، اور ایک بار تین مرتبہ اللہ کی قسم کھا کر ارشاد فرمایا کہ اللہ کی قسم! وہ شخص مؤمن نہیں ہے، اللہ کی قسم! وہ شخص مؤمن نہیں ہے، اللہ کی قسم! وہ شخص مؤمن نہیں ہے۔ نبی کریم ﷺ کی ہر بات سچی ہوتی ہے، کیوں کہ آپ ﷺ کی زبانِ مبارک سے وہی بات نکلتی ہے جو اللہ چاہتے ہیں، اس لیے کسی بات کو سچ ثابت کرنے کے لیے قسم کھانے کی ضرورت نہیں ہوتی ہے پھر بھی اللہ کے نبی ﷺ قسم کھا کر کوئی بات ارشاد فرمائیں تو سمجھو کہ کوئی بہت اہم بات ارشاد فرمارہے ہیں جس میں کسی قسم کی کوتاہی کی گنجائش نہیں ہے، تو جب آپ ﷺ نے ایک بار نہیں تین تین بار قسم کھاکر ارشاد فرمایا کہ وہ شخص مؤمن نہیں ہے تو صحابۂ کرام رضوان اللہ علیہم اجمعین نے پوچھا: اے اللہ کے رسول! آپ کس کے بارے میں فرمارہے ہیں؟ تو آپ ﷺ نے فرمایا: جس کا پڑوسی اُس کی تکلیفوں سے محفوظ نہ ہو یعنی جو شخص اپنے پڑوسی کو تکلیف پہنچاتا ہو اس کو ستاتا ہو اس کے حقوق کا خیال نہ رکھتا ہو وہ شخص سچا اور پکا مؤمن نہیں ہے، ایک بار آپ ﷺ نے ارشاد فرمایا: وہ شخص جنت میں داخل نہیں ہوگا جس کی تکلیفوں سے اُس کا پڑوسی محفوظ نہ ہو۔ کتنی سخت وعید ہے کہ جو شخص اپنے پڑوسی کو ستاتا ہو وہ جنت میں جانے سے محروم رہ جائے گا۔ اِن احادیث کی روشنی میں ہم سب کو چاہیے کہ ہماری کسی حرکت یا کسی عمل سے ہمارے پڑوسی کو کوئی تکلیف نہ پہنچنے پائے، یہاں تک کہ ہم ہم اپنے گھر کے باہر جنریٹر بھی اِس طرح نہ چلائیں کہ ہم تو رات بھر آرام سے سوتے رہیں اور ہمارا پڑوسی جنریٹر کی آواز سے پریشان رہے، اپنے گھر کے سامنے جھاڑو لگا کر کوڑا پڑوسی کے گھر کی طرف نہ پھینکیں، نالی صاف کرکے کچرے کا ڈھیر ایسی جگہ نہ لگائیں کہ پڑوسی کو آنے جانے میں دقت ہو یا کچرے کی بدبو پڑوسی کے گھر تک جائے، اپنا مکان بناتے وقت بھی اِس بات کا خیال رکھیں کہ آپ کی دیوار سے پڑوسی کے گھر میں ہوا یا روشنی بند نہ ہو، اپنی چھت پر اتنی اونچی دیوار ضرور اٹھائیں کہ آپ کی چھت پر کوئی جائے تو پڑوسی کا آنگن دکھائی نہ دے، کیا پتا پڑوسی کے گھر میں کوئی کس حال میں بیٹھا ہو اور آپ کی نظر پڑ جائے جس سے اس کو تکلیف اور ناگواری ہو۔ غرضیکہ ہر ایسا کام جس سے پڑوسی کو معمولی تکلیف ہو یا ناگوار گذرے نہیں کرنا چاہیے، جو لوگ پڑوسیوں کو تکلیف نہ پہنچانے کا خیال رکھتے ہیں وہ معمولی معمولی باتوں پر بھی بہت توجہ دیتے ہیں، چنانچہ امام غزالی رحمہ اللہ نے اپنی کتاب اِحیاء العلوم میں ایک واقعہ لکھا ہے کہ ایک شخص کے گھر میں چوہے بہت ہوگیے تھے، تو چوہوں سے نجات پانے کے لیے کسی نے مشورہ دیا کہ اپنے گھر میں بلی پال لو بس بلی کے ڈر سے سارے چوہے بھاگ جائیں گے، تو اُس شخص نے بلی پالنے سےاس لیے انکار کردیا کہ بلی کے ڈر سے چوہے میرے گھر سےتو نکل جائیں گے لیکن پڑوسی کےگھر میں چلے جائیں گے اور اس کو ستائیں گے اس لیے میں یہ نہیں چاہتا کہ میرے کسی عمل سے پڑوسی کو تکلیف ہو۔ اللہ اکبر!!! کیسے نیک لوگ تھے، ایک ہم ہیں کہ اپنے آرام و راحت کے لیے پڑوسی کا بالکل خیال نہیں کرتے ہیں، جب کہ ہونا یہ چاہیے کہ پڑوسی کو آرام پہنچانے کے لیے خود تکلیف برداشت کرلیں، ویسے بھی مذہبِ اسلام نے ہر موقع پر اپنے سے زیادہ دوسرے کا خیال رکھنے کی تعلیم دی ہے۔

پڑوسیوں کو کسی بھی قسم کی تکلیف نہیں پہنچانی چاہیے، یہاں تک زبان سے بھی پڑوسی کو کوئی تکلیف دِہ بات نہیں کہنی چاہیے، سخت گناہ ہے، ایک مرتبہ نبی کریم ﷺ کی مجلس میں ایک صحابی نے عرض کیا کہ اے اللہ کے رسول! ایک عورت ہے جس کے بارے میں بڑا چرچا ہے کہ وہ بہت نماز پڑھتی ہے، بہت روزے رکھتی ہے، صدقہ خیرات بھی بہت کرتی ہے مگر اُس کی عادت یہ ہے کہ وہ اپنی زبان سے اپنے پڑوسی کو ستاتی ہے، تو ایسی عورت کے بارے میں کیا حکم ہے؟ نبی کریم ﷺ نے صاف لفظوں میں ارشاد فرمایا: یہ عورت دوزخ میں جائے گی۔ پھر انہی صحابی نے عرض کیا کہ اے اللہ کے رسول! ایک اور عورت ہے جو روزے تو کم رکھتی ہے، نماز بھی کم پڑھتی ہے، صدقہ خیرات بھی بہت کم کرتی ہے، مگر اس کی عادت یہ ہے کہ وہ اپنی زبان سے اپنی پڑوسی کو تکلیف نہیں دیتی ہے تو ایسی عورت کے بارے میں کیا حکم ہے؟ آپ ﷺ نے صاف لفظوں میں ارشاد فرمایا: یہ عورت جنت میں جائے گی۔ اِس حدیث سے معلوم ہوا کہ پڑوسی کو زبان سے بھی تکلیف پہنچانا اتنا بڑا گناہ ہے کہ نماز، روزے اور صدقہ خیرات ہوتے ہوئے بھی دوزخ میں جانا پڑے گا۔ زبان سے تکلیف دینے کا مطلب گالی دینا، جھوٹی تہمت لگانا، برائی کرنا، غیبت کرنا وغیرہ جس سے پڑوسی کو تکلیف ہو۔

پڑوسیوں کے ساتھ اچھا برتاؤ کرنا اور ان کے حقوق کا ادا کرنا اتنا ضروری ہے کہ نبی کریم ﷺ فرماتے ہیں کہ حضرت جبرئیل علیہ السلام ہمیشہ مجھے پڑوسیوں کے ساتھ حُسنِ سلوک کرنے کی اتنی تاکید کرتے تھے کہ مجھے یہ خیال ہونے لگا کہ کہیں گھر کے افراد کےساتھ پڑوسیوں کو بھی وراثت میں حصہ دینے کا حکم نہ دیدیں۔ 

پڑوسیوں کے حقوق کی تفصیل بیان کرتے ہوئے آپ ﷺ نے ارشاد فرمایا: (۱) جب آپ کا پڑوسی بیمار ہوجائے تو اس کی دیکھ ریکھ کرو۔ یعنی بیمار پڑوسی کو جس چیز کی ضرورت ہو اور آپ وہ ضرورت پوری کرسکتے ہوں تو آپ پر ضروری ہے کہ اس کی مدد کریں، بیمار پڑوسی کے لیے دوا لانے والا کوئی نہ ہو تو آپ دوا لاکر دے دیں، اس کو ڈاکٹر کے یہاں یا اسپتال لے جانے کی ضرورت ہو تو آپ اپنی گاڑی سے یا گاڑی کا انتظام کرکے اس کو پہنچانے میں مدد کریں۔ دوا علاج کے لیے اس کے پاس پیسے نہ ہوں تو آپ اس کے لیے پیسوں کا انتظام کریں، آپ خود ڈاکٹر ہوں تو بیمار پڑوسی کی حیثیت کے مطابق اُس کا مفت علاج کریں یا کم پیسوں میں کریں۔ (۲) اگر پڑوسی کا انتقال ہوجائے تو اس کے جنازے میں شریک ہوں۔ (۳) اگر پڑوسی کسی ضرورت کے لیے آپ سے قرض مانگے تو اس کو قرض دیں۔ اور یہ قرض بغیر سود کے دیں، جتنا دیں اُس سے زیادہ ہرگز نہ لیں، ہاں اُس کی حیثیت کے مطابق پورا قرض معاف کردیں یا کچھ قرض معاف کردیں، یعنی اگر پڑوسی غریب ہو قرض ادا کرنے کی طاقت نہ رکھتا ہو تو پورا قرض معاف کردیں یا وہ جتنا ادا کرسکتا ہو اُتنا لے لیں باقی معاف کردیں۔ (۴) اگر پڑوسی کسی مصیبت میں گرفتار ہوجائے تو اس کی خبر گیری کرو‌۔ یعنی اس کی مصیبت دور کرنے کی پوری کوشش کرو، جیسے آپ کے پڑوسی پر کوئی ظلم کررہا ہے، اُس کو ناحق ستارہا ہے، تو آپ اُس کو ظالم کے ظلم سے بچانے میں مدد کرو، کسی نے آپ کے پڑوسی پر ناحق مقدمہ کردیا تو آپ سے جو ہوسکے اس کی مدد کرو، آپ کا پڑوسی کسی کا قرض دار ہے اور قرض کی ادائیگی کے لیے اس کے پاس انتظام نہیں ہے، اور قرض خواہ پریشان کررہا ہے تو آپ اس کی قرض کی ادائیگی میں مدد کریں، آپ کے پڑوسی کے گھر کسی کا انتقال ہوجائے تو اس کے یہاں آئے ہوئے مہمانوں اور اس کے بچوں کے کھانے پینے کا انتظام کردیں، غرضیکہ آپ کا پڑوسی جس قسم کی مصیبت میں گرفتار ہو تو آپ ہرممکن اس کا تعاون کریں۔ (۵) آپ کے پڑوسی سے کوئی غلطی ہوجائے تو پردہ پوشی کرو۔ یعنی آپ کا پڑوسی کوئی غلط کام کربیٹھے تو پورے محلے اور معاشرے میں اس کو بدنام نہ کرو، لوگوں سے بتاتے نہ پھرو بلکہ اس پر پردہ ڈال دو اور یہ سمجھو کہ کچھ ہوا ہی نہیں ہے۔ افسوس ہوتا ہے کہ آج کسی کو بدنام کرنے والا پہلا شخص اُس کا پڑوسی ہی ہوتا ہے۔ (۶) آپ کے گھر میں سالن بنے تو اِس طرح بناؤ کہ سالن کی خوشبو پڑوسی کے گھر تک نہ پہنچے، اور اگر سالن کی خوشبو پڑوسی کے گھر پہنچ رہی ہو تو اُس کے گھر سالن ضرور بھیجو تاکہ اُس کے بچوں کو آپ کے سالن کی خوشبو سے تکلیف نہ ہو۔

پڑوسیوں کے درمیان محبت اور تعلق قائم رکھنے کے لیے نبی کریم ﷺ نے ایک دوسرے کو ہدیہ و تحفہ دینے کا حکم دیتے ہوئے فرمایا کہ اگر آپ کے گھر میں سالن بن رہا ہو تو شوربا زیادہ کردو اور تھوڑا سا سالن پڑوسی کے گھر بھی بھیج دو، اور یہ سالن صرف ایک مثال ہے، مطلب یہ ہے کہ آپ کے گھر میں جب بھی کوئی اچھی چیز بنے تو تھوڑا سا پڑوسی کے گھر بھی بھیج دو، ایک حدیث سے معلوم ہوتا ہے کہ پڑوسی کے گھر بھیجنے کےلیے کوئی زیادہ قیمتی چیز ہی ہونا ضروری نہیں ہے، معمولی چیزیں بھی بھیج دینی چاہیے، اگر کوئی عورت اپنی پڑوسن عورت کے گھر کوئی معمولی چیز بھیجے تو اُس کو حقیر نگاہ سے نہ دیکھے بلکہ خوش دلی سے قبول کرلے، اِس طرح ایک دوسرے کے گھر چیزیں بھیجنے سے آپس میں محبت بڑھتی ہے، تعلقات مضبوط ہوتے ہیں، ایک دوسرے کے دل میں ہمدردی پیدا ہوتی ہے۔

پڑوسی کے دکھ درد کا خیال نہ رکھنے والے کے بارے میں آپ ﷺ نے ارشاد فرمایا کہ وہ شخص مؤمن نہیں ہے جو خود تو پیٹ بھر کھائے اور اُس کا پڑوسی بھوکا رہے۔ یہاں بھی کھانا اور بھوک صرف ایک مثال ہے، مطلب یہ ہے کہ آپ کے پاس ضروریاتِ زندگی کی ایسی چیزیں ہیں جن سے آپ کا پڑوسی محروم ہے تو اپنے میں سے کچھ پڑوسی کے لیے بھی انتظام کردیں، مثلاً: پڑوسی کے پاس کھانے کا انتظام نہیں ہے تو آپ اس کے گھر کھانا بھیج دیں، پہننے کے لیے وہ کپڑوں کا محتاج ہے تو آپ اُس کے لیے کپڑوں کا انتظام کردیں، جاڑے کے موسم میں گرم کپڑوں یا لحاف اور چادر وغیرہ کی اس کو ضرورت ہو تو آپ اس کا انتظام کردیں، ایسا نہ ہو کہ آپ گرم گرم بستروں میں رات بھر آرام سے سوتے رہیں اور آپ کا پڑوسی رات بھر جاڑے میں ٹھٹھرتا رہے اور سو بھی نہ پائے، اسی طرح آپ کے گھر میں گرم پانی کا انتظام ہو تو پڑوسی کے گھر میں تھوڑا گرم پانی بھیج دیا کریں تاکہ اُس کے بچے بھی ٹھنڈک میں گرم پانی سے نہاسکیں، ایسے ہی گرمی کے موسم میں آپ کے گھر فریج ہے تو دو ایک بوتل ٹھنڈا پانی پڑوسی کے گھر بھی بھیج دیں تاکہ وہ بھی ٹھنڈا پانی پی سکے۔ غرضیکہ پڑوسی کا ہر طرح سے خیال رکھنا چاہیے۔

پڑوسی کے ساتھ اچھا سلوک کرنا اور اس کو تکلیف نہ پہنچانا یہ اِتنا اہم ہے کہ نبی کریم ﷺ نے انسان کے اچھا اور برا ہونے کا مدار اسی کو بنادیا۔‌ چنانچہ ایک بار ایک شخص نے نبی کریم ﷺ سے پوچھا کہ اے اللہ کے رسول! مجھے کیسے معلوم ہو کہ میں اچھا ہوں یا برا ہوں؟ تو آپ ﷺ نے فرمایا کہ جب تم سنو کہ تمھارا پڑوسی تمھاری تعریف کررہا ہے اور کہہ رہا ہے کہ تم اچھے ہو تو واقعی تم اچھے ہو، اور جب تم سنو کہ تمھارا پڑوسی تمھارے بارے میں کہہ رہا ہے کہ تم برے ہو تو واقعی تم برے ہو۔ ظاہر سی بات ہے کہ جب ہم اپنے پڑوسی کے ساتھ اچھا برتاؤ کریں گے تو وہ ہماری تعریف ہی کرے گا، اور جب اُس کے ساتھ برا سلوک کریں گے تو وہ ہم کو برا ہی کہے گا۔

ایک بار امیر المومنین حضرت عمر رضی اللہ عنہ کی خدمت میں ایک مقدمہ آیا، اُس مقدمے کے دو گواہ پیش کیے گئے، ایک گواہ کے بارے میں حضرت عمر رضی اللہ عنہ جانتے تھے کہ اس کی گواہی قابلِ قبول ہے، مگر دوسرے گواہ کے بارے میں معلوم نہیں تھا کہ وہ کیسا ہے؟ تو حاضرین سے پوچھا کہ کوئی شخص اس کے اچھا یا برا ہونے کو جانتا ہے؟ تو ایک شخص نے کھڑے ہوکر کہا کہ ہاں میں جانتا ہوں یہ شخص اچھا ہے۔ تو امیرالمؤمنین نے پوچھا کہ تم کو کیسے معلوم کہ یہ اچھا شخص ہے کیا تم اس کے پڑوسی ہو؟ یا تم نے کبھی اس کے ساتھ سفر کیا ہے؟ اُس شخص نے کہا کہ جی نہیں! نہ میں اس کا پڑوسی ہوں نہ میں نے اس کے ساتھ سفر کیا ہے۔ تو امیرالمؤمنین نے فرمایا کہ لگتا ہے تم نے اِس آدمی کو مسجد سے نکلتے ہوئے دیکھا ہے اور اسی لیے فیصلہ کردیا کہ یہ اچھا آدمی ہے؟ امیر المؤمنین حضرت عمر رضی اللہ عنہ کے فرمان کا مطلب یہ تھا کہ کوئی شخص صرف مسجد سے نماز پڑھ کر نکلنے سے اچھا آدمی نہیں ہوجاتا ہے بلکہ ضروری ہے کہ وہ اپنے پڑوسی کے ساتھ اچھا سلوک کرے اور اس کے پڑوسی اس کے اچھا ہونے کی گواہی دیں۔ ورنہ نماز، روزہ، زکوٰۃ اور حج وغیرہ عبادات کا اہتمام کرنے کے باوجود ہم اچھے نہیں رہیں گے۔ ایک بار نبی کریم ﷺ نے ارشاد فرمایا کہ اللہ کے نزدیک بہترین پڑوسی وہ ہے جو اپنے پڑوسی کے ساتھ اچھا سلوک کرتا ہو۔ اِن تمام احادیث سے نبی کریم ﷺ اپنی امت کو یہی سکھارہے ہیں کہ ہر مؤمن اپنے پڑوسی کے ساتھ اچھا سلوک کرے اور اُس کو کسی قسم کی تکلیف نہ پہنچنے دے۔

واضح رہے کہ ایک پڑوسی تو وہ ہے جو مستقل پڑوسی ہے یعنی جو آپ کے گھر کا پڑوسی ہے اور ایک پڑوسی وہ بھی ہے جو کچھ دیر کے لیے آپ کا پڑوسی بنا ہے، جیسے آپ بس، ٹرین یا ہوائی جہاز میں سفر کررہے ہوں اور آپ کے بغل میں کوئی بیٹھا ہو یا آپ مسجد، یا کسی دینی و دنیاوی مجلس یا جلسوں میں ہوں اور آپ کے بغل میں کوئی بیٹھا ہو وہ بھی تھوڑی دیر ہی کے لیے سہی لیکن آپ کا پڑوسی ہے اس کے ساتھ بھی اچھا سلوک کرنے کا قرآن کریم نے حکم دیا ہے، لہٰذا ایسے پڑوسی کو بھی آرام پہنچانے کا خیال رکھنا چاہیے اور ہر ایسے کام سے بچنا چاہیے جس سے اُس بغل والے پڑوسی کو تکلیف پہنچے، جیسےبیڑی یا سیگریٹ کے دھوئیں سے اسی طرح آپ کے گٹکھا وغیرہ کھانے سے اُس کو تکلیف ہورہی ہو تو ہر گز ایسی چیزوں کا استعمال نہ کریں۔

آخر میں درخواست کی کہ جو باتیں عرض کی گئی ہیں اُن پر ہم لوگ ضرور عمل کریں، اگر ہم سب لوگ اپنے اپنے پڑوسی کا خیال کرنے لگیں تو نہ ہم سے کسی کو تکلیف پہنچے اور نہ ہم کو کسی سے تکلیف پہنچے، اِس طرح ہمارا معاشرہ ایک بہترین اور خوشگوار معاشرہ بن سکتا ہے۔

پھر دعا پر پروگرام کا اختتام ہوا۔

اِس پروگرام میں کافی لوگ موجود تھے، قصبہ کے معزز لوگوں کے ساتھ ساتھ نوجوانوں کی ایک بڑی تعداد موجود تھی۔