Saturday, June 17, 2023

अहकामे ज़िल्हिज्जा (दूसरी क़िस्त)

अहकामे ज़िल्हिज्जा
(दूसरी क़िस्त)

🖊️ ज़ैनुल आबिदीन क़ासमी
ख़ादिम जामिया क़ासमिया अशरफ़ुल उलूम नवाबगंज अलियाबाद ज़िला बहराइच यू०पी०
9670660363

यौमे अरफ़ा और उस की फ़ज़ीलत:

ज़ुल्हिज्जा की नवीं तारीख़ को “यौमे अरफ़ा” कहा जाता है, इस दिन रोज़ा रखना मुस्तहब है और उस की फ़ज़ीलत ये है कि इस से दो साल के गुनाह मुआफ़ हो जाते हैं।

नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया:

“अरफ़ा के दिन का रोज़ा; बेशक मैं अल्लाह तआला से सवाब की उम्मीद बाँधता हूँ कि वह मिटा देंगे उस साल (के गुनाहों) को जो बाद में आने वाला है और उस साल (के गुनाहों) को जो गुज़र चुका है।(यानी एक साल अगले और एक साल पिछले के गुनाहों को मिटा देंगे।” (मुस्लिम , तिर्मिज़ी)

यौमुन्नह्र/यौमुल अज़्हा :

ज़ुल्हिज्जा की दसवीं तारीख़ को “यौमुन्नह्र, यौमुल अज़्हा” यानी क़ुर्बानी का दिन और “ईदुल अज़्हा, ईदे कुर्बाँ और बक़रईद” कहा जाता है। इसी दिन दूसरी ईद यानी ईदुल्अज़्हा मनाई जाती है, और यह दिन मुस्लमानों का दूसरा मज़्हबी (धार्मिक) त्योहार है।

इस्लामी त्योहार; ईदुल फ़ित्र और ईदुल अज़्हा:

रसूलुल्ला सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का इरशाद है:

“हर क़ौम की (कोई न कोई) ईद होती है और हमारी ईद यह है।” (बुख़ारी)

हज़रत मौलाना मुहम्मद मन्ज़ूर नोमानी रहि० तहरीर फ़रमाते हैं:
“हर क़ौम के कुछ ख़ास त्योहार और जश्न के दिन होते हैं, जिनमें उस क़ौम के लोग अपनी अपनी हैसियत और सतह के मुताबिक़ अच्छा लिबास पहनते और उम्दा खाने पकाते और खाते हैं, और दूसरे तरीक़ों से भी मुसर्रत ख़ुशी का इज़्हार करते हैं, यह गोया इन्सानी फ़ित्रत का तक़ाज़ा है; इसी लिए इन्सानों का कोई तब्क़ा और फ़िर्क़ा ऐसा नहीं है जिसके यहाँ त्योहार और जश्न के कुछ ख़ास दिन ना हों।
इस्लाम में भी ऐसे दो दिन रखे गए हैं; एक ईदुल फ़ित्र और दूसरे ईदुल अज़्हा, बस यही मुस्लमानों के असली मज़्हबी व मिल्ली त्योहार हैं। इनके इ
अलावा मुस्लमान जो त्योहार मनाते हैं उनकी कोई मज़्हबी हैसियत और बुनियाद नहीं है; बल्कि इस्लामी नुक़्ता-ए-नज़र से उनमें से अक्सर ख़ुराफ़ात हैं।
मुस्लमानों की इज्तिमाई ज़िंदगी उस वक़्त से शुरू होती है जब कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम हिजरत फ़रमा कर मदीना तैय्यबा आए। ईदुल फ़ित्र और ईदुल अज़्हा, इन दोनों त्योहारों का सिलसिला भी उसी वक़्त से शुरू हुआ है। जैसा कि मालूम है ईदुल फ़ित्र रमज़ानुल मुबारक के ख़त्म होने पर पहली शव्वाल को मनाई जाती है और ईदुल अज़्हा 10 ज़ुल्हिज्जा को। रमज़ानुल मुबारक दीनी व रूहानी हैसियत से साल के बारह महीनों में सबसे मुबारक महीना है, इसी महीने में क़ुरआने मजीद नाज़िल होना शुरू हुआ, इसी पूरे महीने के रोज़े उम्मते मुस्लिमा पर फ़र्ज़ किए गए, इस की रातों में एक मुस्तक़िल बाजमाअत नमाज़ (तरावीह) का इज़ाफ़ा किया गया है, और हर तरह की नेकियों में इज़ाफ़ा की तर्ग़ीब दी गई । उल-ग़र्ज़ यह पूरा महीना ख़्वाहिशात की क़ुर्बानी और मुजाहिदा का और हर तरह की ताआत व इबादात की कसरत का महीना क़रार दिया गया, ज़ाहिर है कि इस महीने के ख़ातमे पर जो दिन आए ईमानी व रूहानी बरकतों के लिहाज़ से वही सबसे ज़्यादा इस का मुस्तहिक़ है कि इस को इस उम्मत के जश्न व मुसर्रत का दिन और त्योहार बनाया जाये, चुनांचे उसी दिन को ईदुल फ़ित्र क़रार दिया गया।
और 10 ज़ुल्हिज्जा वो मुबारक तारीख़ी दिन है जिसमें उम्मते मुस्लिमा के मुअस्सिस व मूरिसे आला सय्यिदुना हज़रत इब्राहीम ख़लीलुल्ला अलैहिस्सलाम ने अपनी दानिस्त में अल्लाह तआला का हुक्म व इशारा पा कर अपने लख़्ते जिगर सय्यिदुना इस्माईल अलैहिस्सलाम को उनकी रजामंदी से क़ुर्बानी के लिए अल्लाह के हुज़ूर में पेश करके और उनके गले पर छुरी रखकर अपनी सच्ची वफ़ादारी और कामिल तस्लीम व -रज़ा का सुबूत दिया था और अल्लाह तआला ने इश्क़ व मुहब्बत और क़ुर्बानी के इस इम्तिहान में उनको कामयाब क़रार देकर हज़रत इस्माईल अलैहिस्सलाम को ज़िंदा व सलामत रखकर उनकी जगह एक जानवर की क़ुर्बानी क़बूल फ़रमा ली थी, और हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम के सर पर (मैं तुमको लोगों का पेशवा बनाऊँगा) का ताज रख दिया था, और उनकी इस अदा की नक़ल को क़ियामत तक के लिए “रस्मे आशिक़ी” क़रार दे दिया था, पस अगर कोई दिन किसी अज़ीम तारीख़ी वाक़िआ की यादगार की हैसियत से त्योहार क़रार दिया जा सकता है तो इस उम्मते मुस्लिमा के लिए जो मिल्लते इब्राहीमी की वारिस और उस्वा-ए-खलीली की नुमाइंदा है 10 ज़ुल्हिज्जा के दिन के मुक़ाबले में कोई दूसरा दिन उस का मुस्तहिक़ नहीं हो सकता; इसलिए दूसरी ईद 10 ज़ुल्हिज्जा को क़रार दिया गया। जिस वादी ग़ैर ज़ी ज़रा (बे-आबो ग्याह) मैं हज़रत इस्माईल अलैहिस्सलाम की क़ुर्बानी का ये वाक़िआ पेश आया था उसी वादी में पूरे आलमे इस्लामी का हज का सालाना इज्तिमा और उस के मनासिके क़ुर्बानी वग़ैरा इस वाक़िआ की गोया असल और अव़्वल दर्जे की यादगार है, और हर इस्लामी शहर और बस्ती में ईद उल अज़्हा की तक़रीबात नमाज़ और क़ुर्बानी वगैरह भी इसी की गोया नक़्ल और दोम दर्जा की यादगार है। बहरहाल इन दोनों (पहली शव्वाल और १० ज़िल्हिज्जा) की इन ख़सूसिय्यात की वजह से इन को यौमुल ईद और उम्मते मुस्लिमा का त्योहार क़रार दिया गया।(मआरिफ़ुल हदीस हिस्सा सोम पेज न० 237,0293)

हज़रतुल उस्ताज़ मुफ़्ती सईद अहमद पालन पूरी साबिक़ शैख़ुल हदीस दारुल उलूम देवबंद फ़रमाते हैं:

“दुनिया में हर क़ौम के लिए ख़ुशी का कोई दिन होता है, अल्लाह अज़् ज़ व जल्ल ने इस उम्मत के लिए ख़ुशी के दो दिन मुक़र्रर किए हैं: ईदुल अज़्हा और ईदुल फ़ित्र, मगर मुस्लमानों का तरीक़ा दीगर अक़्वाम से मुख़्तलिफ़ है, इस्लाम ने ख़ुशी के दिनों में भी सबसे पहला काम इबादत मुक़र्रर किया है, दूसरी कौमें ख़ुशी के दिनों में शोर शराबा करती हैं, वो कोई इबादत नहीं करतीं, हम सबसे पहले दोगाना अदा करते हैं.......फिर चूँकि ये दोनों दिन सुरूर इंबिसात (ख़ुशी) के दिन हैं इसलिए दीगर ख़ुशी के काम भी जाएज़ हैं; बल्कि ऐसे काम जो गूना मुनासिब नहीं उन से भी सर्फ़े नज़र की जाती है।” (तोहफ़तुल क़ारी शरह बुख़ारी जिल्द 3 पेज 280)

(जारी)

No comments:

Post a Comment