Friday, June 16, 2023

अहकामे ज़िल्हिज्जा

अहकामे ज़िल्हिज्जा

(पहली क़िस्त)

🖊️ ज़ैनुल आबिदीन क़ासमी
ख़ादिम जामिया क़ासमिया अशरफ़ुल उलूम नवाबगंज अलियिबाद ज़िला बहराइच
9670660363

ज़ुल्हिज्जा:

इस्लामी/हिज्री कैलेंडर का बारहवाँ और आख़िरी महीना ज़ुल्हिज्जा है, यह महीना उन तीन महीनों में से एक है जिनको “अश्हुरे हज” (हज के महीने) कहा जाता है।

फ़ायदा: शव्वाल, ज़ुल्क़ादा और ज़ुल्हिज्जा के दस दिन“अश्हुरे हज” (हज के महीने) कहे जाते हैं।

इसी तरह ज़ुल्हिज्जा उन चार महीनों में से एक है जिनको “अश्हुरे हुरुम” (अज़्मत व हुर्मत वाले महीने) कहा जाता है।

फ़ायदा: ज़ुल्क़ादा, ज़ुल्हिज्जा, मुहर्रम और रजब “अश्हुरे हुरुम” (अज़्मत व हुर्मत वाले महीने) कहे जाते हैं।

ज़ुल्हिज्जा के महीने से इस्लाम की तीन ऐसी इबादतें मुतअल्लिक़ हैं जो साल में एक बार और इसी महीने में आती हैं।

एक तो इस्लाम का आख़िरी और तक्मीली रुक्न “हज”
दूसरी “नमाज़े ईदुल अज़्हा”
और तीसरी “क़ुर्बानी” है।

अशरा-ए-ज़िल्हिज्जा:

इस महीना के शुरू वाले दस दिनों यानी पहली तारीख़ से दस तारीख़ तक को “अशरा-ए-ज़िल्हिज्जा” कहा जाता है , इन दस दिनों को ख़ास फ़ज़ीलत हासिल है।

क़ुरआने करीम के तीसवें पारे की सूरह-ए-फ़ज्र में इन दस रातों की क़सम खाई गई है:

हज़रत मौलाना अशरफ़ अली थानवी (रहि०) इस आयते करीमा का तफ़्सीरी तर्जुमा यूं फ़रमाते हैं:

“क़सम है फ़ज्र (के वक़्त) की, और (ज़िल्हिज्जा की) दस रातों (यानी दस तारीख़ों) की (कि वो निहायत फ़ज़ीलत वाली हैं...) और जुफ़्त की और ताक़ की (जुफ़्त से मुराद दसवीं तारीख़ ज़िल्हिज्जा की और ताक़ से नवीं तारीख़...)” (तफ़्सीर बयानुल क़ुरआन जिल्द 3 पेज 654)

हज़रत मुफ़्ती मुहम्मद शफ़ी उस्मानी साहब (रहि०) इस आयते करीमा की तफ़्सीर में फ़रमाते हैं:

“लयालिन अश॒र् यानी दस रातें, हज़रत इब्ने अब्बास रज़ि०, क़तादा, मुजाहिद, सुद्दी, ज़ह्हाक, कल्बी अइम्मा-ए-तफ़्सीर के नज़्दीक ज़िल्हिज्जा की इब्तिदाई दस रातें मुराद हैं; क्यूंकि हदीस में इनकी बड़ी फ़ज़ीलत आई है ........ और अबुज़्ज़बैर ने हज़रत जाबिर रज़ि० से रिवायत किया है कि ख़ुद रसूलुल्ला सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने व ल यालिन अश॒र् की तफ़्सीर में फ़रमाया कि इस से मुराद अशरा-ए-ज़िल्हिज्जा है।”(मआरिफ़ुल क़ुरआन 8/739)

हज़रत मुफ़्ती मुहम्मद तक़ी उस्मानी साहब फ़रमाते हैं:

“और दस रातों से मुराद ज़ुल्हिज्जा के महीने की पहली दस रातें हैं जिनको अल्लाह तआला ने ख़ुसूसी तक़द्दुस अता फ़रमाया है, और
उस में इबादत का बहुत सवाब है। जुफ़्त से मुराद 10 ज़ुल्हिज्जा का दिन और ताक़ से मुराद अर्फ़े का दिन है जो 9/ज़ुल्हिज्जा को आता है। इन अय्याम (दिनों) की क़सम खाने से उनकी अहमियत और फ़ज़ीलत की तरफ़ इशारा है।” (आसान तर्जुमा-ए-क़ुरआन 3/1922)

हदीस शरीफ़ में भी इन दस दिनों की बड़ी फ़ज़ीलत आई है:

हज़रत इब्ने अब्बास रज़ि० से रिवायत है कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया:

“नहीं है कोई भी दिन जिस में नेक अमल अल्लाह तआला को ज़्यादा पसंद हो इन दस दिनों से (यानी अल्लाह तआला को सबसे ज़्यादा पसंद इन दस दिनों के आमाल हैं; अल्बत्ता इस से रमज़ान मुस्तस्ना (अलग) है, जैसे बअज़ हदीसों में नवाफ़िल की फ़ज़ीलत आई है उनसे फ़र्ज़ वाजिब और सुनने मुअक्कदा मुस्तस्ना हैं) लोगों ने पूछा: ऐ अल्लाह के रसूल! अल्लाह के रास्ते में जिहाद करना भी? (यानी इन दस दिनों के अलावा दिनों में अगर अल्लाह के रास्ते में जिहाद किया जाये तो क्या वो भी अल्लाह को ज़्यादा पसंद नहीं? रसूलुल्ला सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया: अल्लाह के रास्ते में जिहाद करना भी, मगर यह कि कोई शख़्स अपनी जान और अपने माल के साथ निकले और उनमें से कुछ भी लेकर वापस ना आए (यानी शहीद हो जाए तो उस का जिहाद अशरा-ए-ज़िल्हज्जा के अमल से अफ़्ज़ल होगा, रहा वो मुजाहिद जो जिहाद से सही सलामत वापस आ गया या दूसरे के तआवुन से जिहाद में गया और शहीद हो गया तो उस का जिहाद इन दस दिनों के अमल से अफ़्ज़ल नहीं होगा)।” (तोहफ़तुल अल्मई शरह तिर्मिज़ी जिल्द 3 पेज 131)

हज़रत मौलाना मन्ज़ूर नोमानी रहि० तहरीर फ़रमाते हैं:

“जिस तरह अल्लाह तआला ने हफ़्ता के सात दिनों में से जुमा को , और साल के बारह महीनों में से रमज़ान मुबारक को और रमज़ान के तीन अशरों में से अशरा-ए-अख़ीर यानी रमज़ान के आख़िरी दस दिनों को ख़ास फ़ज़ीलत बख़्शी है इसी तरह ज़ुल्हिज्जा के पहले अशरा (यानी शुरू के दस दिनों) को भी फ़ज़्ल-व-रहमत का ख़ास अशरा क़रार दिया है, बहर हाल यह रहमते ख़ुदावंदी का ख़ास अशरा है, इन दिनों में बन्दे का हर नेक अमल अल्लाह तआला को बहुत महबूब (पसंद) है, और उस की बड़ी क़ीमत है।” मआरिफ़ुल हदीस जिल्द 3 पेज 417/418)

एक दूसरी हदीस में आँहज़रत सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया:

“किसी भी दिन में इबादत करना अल्लाह को इतना महबूब (पसंदीदा) नहीं जितना अशरा-ए-ज़िल्हिज्जा में इबादत करना महबूब है। (यानी इन दिनों की इबादत अल्लाह तआला को दूसरे दिनों की इबादत से ज़्यादा महबूब है) इस अशरा के हर दिन का रोज़ा साल भर के रोज़ों के बराबर है और इस की हर रात की नफ़्लें शबे क़द्र की नफ़्लों के बराबर हैं।” (तिर्मिज़ी, इब्ने माजा)

हज़रतुल उस्ताज़ मुफ़्ती सईद अहमद पालन पूरी साबिक़ शैख़ुल हदीस दारुल उलूम देवबंद फ़रमाते हैं:

“अशरा-ए-ज़िल्हिज्जा के रोज़े बिल्इज्मा मुस्तहब हैं , और अशरा से मुराद ज़िल्हिज्जा के शुरू के नौ दिन हैं, दसवाँ दिन मुराद नहीं; इसलिए कि वो ईदुल अज़्हा का दिन है उस में रोज़ा हराम है।”
(तोहफ़तूल अल्मई 3/129,130)

(जारी)

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